1. सदाचरण क्या है? - Page 387

358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

चीज को ग्रहण नहीं करता जो उसे दी न गई हो। वह एक ईमानदार का जीवन

व्यतीत करता है। (iii) वह काम-भोग संबंधी मिथ्याचार से दूर रहते हुए व्यभिचार

से विरत रहता है। वह माँ या पिता या भाई या बहन या सम्बन्धियों की निगरानी

में रहने वाली लड़कियों के साथ कोई संसर्ग नहीं करता और मँगनी की हुई या

मँगनी की मालायें पहने हुई लड़कियों के साथ भी कोई संसर्ग नहीं करता।’’

  1. ‘‘जहाँ तक वाणी के सदाचरण का सम्बन्ध हैं, (i) एक मनुष्य झूठ बोलने से

दूर रहता है और मृषावाद से विरत रहता है। जब सभा या ग्राम-पंचायत या

पारिवारिक परिषद या राजकीय-परिषद या अपने संघ के समक्ष साक्षी देने के

लिये बुलाया जाता है, तो वह न जानते हुए कहता है कि मैं नहीं जानता, जानते

हुए कहता है कि मैं जानता हूँ, न देखते हुए कहता है कि मैंने नहीं देखा, देखते

हुए कहता है कि मैंने देखा है। (ii) वह चुगलखोरी नहीं करता, यहाँ सुनी और

वहाँ कह दी, ताकि यहाँ के लोगों और वहाँ के लोगों का झगड़ा हो जाये, या

वहाँ सुनी और वहाँ कह दी ताकि वहाँ के लोगों और यहाँ के लोगों का झगड़ा

हो जाए। वह शांति को भंग करने वाला और अशान्ति को उत्तेजित करने वाला

नहीं होता, शान्ति कराने की नीयत से बोलता है, मेल-मिलाप कराने में ही उसे

आनन्द आता है, या प्रसन्नता होती है। स्वयं अपने या दूसरे लोगों के हित में या

किसी तुच्छ के लिये वह कभी भी जान-बूझकर झूठ नहीं बोलता। (iii) उसकी

जबान में कोई कड़वाहट नहीं होती और वह कटु वाणी से विरत रहता है। वह

जो कहता है वह बिना कटुता के, प्रीतिकर मैत्रीपूर्ण हार्दिक, सौम्य, सुखद और

सबके द्वारा स्वागत के योग्य होता है। (iv) गप्पी नहीं होता, वह गप्प से विरत

रहता है, मौके पर बात करने वाला, तथ्यों के अनुरूप, सदैव लाभप्रद बातें

करने वाला, धर्म और नीति की बातें करने वाला, ऐसी वाणी बोलने वाला जो

समयानुकूल और याद रखने योग्य प्रबद्ध करने वाली, सुव्यवस्थित और अत्यन्त

लाभदायक हो।

  1. ‘‘जहाँ तक मन के सदाचरण का सम्बन्ध है (i) एक मनुष्य लोलुपता से रहित

है, वह कभी नहीं चाहता कि दूसरे लोगों की सम्पत्ति का अधिकार उसे मिल

जाए, अर्थात् कभी भी लोभ नहीं करता। (ii) वह अपने मन में कोई दुर्भावना

नहीं रखता, उसकी सदैव इच्छा होती है कि उसके आस-पास के सभी प्राणी

शान्ति और सुख के साथ रहें, सभी प्रकार की शत्रुता और अत्याचार से सुरक्षित

रहें। (iii) उसकी दृष्टि सम्यक् होती है और उसकी अवधारणाएँ सही होती

हैं।’’

  1. ‘‘सदाचरण और दुराचरण में मेरा यही अभिप्राय है।’’