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2. सदाचरण की आवश्यकता
- तब तथागत ने पाटलिग्राम के उपासकों को सम्बोधित कियाः
- ‘‘गृहस्थो! जो दुष्ट और दुश्शील मनुष्य है उस को दुष्परिणाम भुगतने पड़ते
हैं।’’
- ‘‘दुष्ट और अनैतिक मनुष्य, प्रमाद के कारण धन की बहुत हानि उठाता
है।’’
- ‘‘तब उसका अपयश होता है, जिससे वह दुनिया की नजरों में गिर जाता
है।’’
- ‘‘वह जिस किसी की भी संगति में जाए, भले ही वह क्षत्रियों की संगति
हो या ब्राह्मणों की या गृहपतियों की या श्रमणों की संगति हो, वह हर जगह
संकोचपूर्वक जाता है और दिग्भ्रमित हो जाता है। वह निर्भय नहीं रहता, यह
तीसरी हानि है।’’
- ‘‘पुनः जब उसकी मृत्यु होती है, तो उसे मन में शान्ति नहीं होती और वह
मन से परेशान रहता है, यह चौथी हानि है।’’
- ‘‘गृहस्थो! ये ऐसी हानियाँ हैं जो दुष्ट और अनैतिक मनुष्यों को भुगतनी पड़ती
हैं।’’
- ‘‘अब उन लाभों पर विचार करो, जो सज्जन मनुष्य को प्राप्त होते हैं, जो
ईमानदारी से जीवन व्यतीत करता है।’’
- ‘‘सज्जन मनुष्य, जो ईमानदारी से जीवन व्यतीत करता है, वह अपने प्रयासों से
बहुत धन-संग्रह कर लेता है।’’
- ‘‘तब, पुनः उसके विषय में अच्छी ख्याति प्रचलित हो जाती है जिससे वह हर
जगह सम्मान पाता है।’’
- ‘‘जिस किसी की भी संगति में जाता है, भले ही वह कुलीनों की हो या ब्राह्मणों
की या गृहपतियों की या श्रमणों की, वह निर्भीक और निस्संकोच के साथ
प्रवेश करता है।’’
- ‘‘पुनः वह मन की शान्ति का आनन्द लेता है और मरते समय शान्त मन होता
है।’’
- ‘‘मूर्ख पाप करते समय अपनी मूर्खता को नहीं जानता। उसके अपने दुष्कर्म ही
अग्नि के समान उसे जला देते हैं।’’