360 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- वह जो हानि रहित और निर्दोष को ठेस पहुँचाता है शीघ्र ही घोर दुर्घटना या
चित्तविक्षिप्तता, सम्बन्धियों की हानि, अपनी सम्पूर्ण संपत्ति की हानि को प्राप्त
होता है।’’
3. सदाचरण और संसार की जिम्मेदारियाँ
- एक बार जब तथागत राजगृह के वेणुवनाराम में ठहरे हुए थे, जहाँ गिलहरियों
को दाना चुगाया जाता था, उसी समय भदन्त सारिपुत्त दक्षिणी पहाडि़यों के मध्य
भिक्षुओं के एक विशाल संघ के साथ भिक्षाटन कर रहे थे।
- अपने मार्ग में उनकी भेंट एक भिक्षु से हुई जिसने राजगृह में वर्षावास व्यतीत
किया था। मैत्री और शिष्टाचार के अभिवादन के आदान-प्रदान के उपरान्त,
सारिपुत्त ने शास्ता के स्वास्थ्य के विषय में पूछा और उन्हें बताया गया कि वे
ठीक हैं। ऐसा ही संघ के विषय में है, और राजगृह में तण्डुलपाल, द्वार के
धनंजानी ब्राह्मण के स्वास्थ्य के विषय में भी सारिपुत्त ने पूछताछ की तो उन्हें
बताया गया कि वह भी अच्छी तरह है।
- क्या धनंजानी ब्राह्मण धर्मोत्साही और अप्रमादी हैं? सरिपुत्त ने आगे भिक्षु से
पूछा।
- भिक्षु का उत्तर था, ‘‘धनंजानी ब्राह्मण कैसे अप्रमादी धर्मोत्साही रह सकता है?’’
भिक्षु ने उत्तर दिया। वह ब्राह्मणों और गृहस्थों को लूटने के लिये राजा का
उपयोग करता है और राजा को लूटने के लिये उनका उपयोग करता है। साथ
ही उसकी धर्मनिष्ठ पत्नी, जो धर्मनिष्ठ कुल से आयी थी, अब मर चुकी है।
और उसने दूसरी पत्नी कर ली है, जो धर्मनिष्ठ नहीं है और धर्मनिष्ठ कुल से
नहीं आयी है।
- सारिपुत्र बोले, ‘‘यह बुरा समाचार है, धनंजानी के धर्मोत्साह की कमी के
विषय में सुनना अत्यन्त बुरा समाचार है’’ सारिपुत्र ने कहा, ‘‘सम्भवत्_ फिर
भी, किसी समय और स्थान पर मेरी उसकी भेंट हो सके तो मैं उससे बातचीत
करना चाहूँगा।
- दक्षिणी पहाडि़यों में यथेच्छ रहने के उपरान्त, सारिपुत्त चारिका करते-करते
राजगृह पहुँच गये, जहाँ उन्होंने वेणुवनाराम में निवास किया।
- प्रातः काल जल्दी ही चीवर पहन और हाथ में भिक्षा का पात्र ले, वे राजगृह
में भिक्षाटन के लिये गये। ऐसे समय में जब धनंजानी ब्राह्मण नगर के बाहर
अपनी गौशाला में गायों को दुहा जाना देख रहा था।