3. सदाचरण और संसार की जिम्मेदारियाँ - Page 390

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  1. अपनी चारिका और भोजन के उपरान्त अपनी वापसी पर सारिपुत्त ने उस ब्राह्मण

को ढूंढ़ लिया। उनको आता देख, ब्राह्मण उनसे मिलने आया और आते ही दूध

पीने का निमंत्रण दिया।

  1. ‘‘ऐसा नहीं, ब्राह्मण! मैं आज का अपना भोजन कर चुका हूँ, और मध्याह्न

के समय एक वृक्ष की छाया के नीचे विश्राम करूँगा। मुझसे मिलने वहाँ

आओ।’’

  1. धनंजानी मान गया और स्वयं अपने भोजन के उपरान्त सारिपुत्त के पास आकर

मैत्रीपूर्ण अभिवादन के बाद वहाँ बैठ गया जहाँ वे बैठे हुए थे। 11. सारिपुत्त ने कहाः ‘‘धनंजानी! क्या मैं पूर्ण विश्वास कर सकता हूँ कि तुम

धर्मोंत्साही, अप्रमादी और सदाचरण वाले हो।’’

  1. ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है जबकि अपने मांस-दूध खाने-पीने की चिन्ता के

अतिरिक्त मुझे अपने माता-पिता, अपनी पत्नी और परिवार के अपने दासों और

नौकर-चाकरों का भरण-पोषण करना पड़ता है और अपने परिचितों व मित्रों,

अपने सगे-सम्बन्धी और अतिथियों का आतिथ्य करना पड़ता है, और साथ ही

अपने पितरों के श्राद्ध के लिये, देवताओं को भी बलि देनी पड़ती है, और राजा

के लिये कर का प्रबन्ध करना पड़ता है।’’

  1. ‘‘धनंजानी तुम क्या सोचते हो? यदि मान लें कि एक मनुष्य ने अपने माता-पिता

के कारण सदाचरण और औचित्य का मार्ग छोड़ दिया है और जब वह पकड़ा

जा रहा हो, तो यदि वह अपनी ओर से निवेदन करे कि उसने माता-पिता के

कारण सदाचरण और औचित्य के मार्ग को छोड़ दिया और इसलिये उसको

पकड़ा नहीं जाना चाहिए, तो क्या यह उसके लिये लाभकारी होगा?’’ 14. ‘‘नहीं_ सभी प्रार्थनाओं के बावजूद संतरी उसे कारागार में डाल देंगे।’’ 15. ‘‘यदि वह स्वयं अपनी और परिवार के ‘सदस्यों की ओर से निवेदन करे कि

उसने उनकी खातिर सदाचरण और औचित्य का मार्ग छोड़ दिया था तो क्या

उससे उसे लाभ होगा?’’

  1. ‘‘नहीं।’’

  2. ‘‘यदि उसके दास और नौकर-चाकर उसकी ओर से निवेदन करें, तो क्या यह

उसके लिये लाभप्रद होगा?’’

  1. ‘‘बिल्कुल नहीं।’’

  2. ‘‘या यदि उसके मित्र और परिचित उसकी ओर से निवेदन करें?’’