4. सदाचरण में सम्पूर्णता कैसे प्राप्त की जाए? - Page 392

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  1. धम्मिक ने तथागत से पूछा, ‘‘सदाचरण में सम्पूर्णता प्राप्त करने के लिए कौन

से सिद्धान्त आपके अनुयायियों के लिए सहायक होते हैं?’’ 3. ‘‘मैं आपसे यह प्रश्न इसलिए पूछता हूँ कि क्योंकि आप मानव-कल्याण के

अनुपम निर्णायक हैं।’’

  1. ‘‘प्रशिक्षित जैन और परिव्राजक सभी आपको पराजित करने में असफल हो चुके

हैं। प्रशिक्षित ब्राह्मण, आयु में परिपक्व अन्य लोगों के साथ जो अपने दृष्टिकोण

को व्यस्त करने को उत्सुक होते हैं - आपके उद्धारक सत्य को ग्रहण कर लेते

हैं। क्योंकि यह आपका उपदिष्ट सत्य बड़ा सूक्ष्म है, किन्तु बड़ा सु-आख्यात

है कि उसके लिए सब तरसते हैं। भगवान! कृपापूर्वक हमें इसका उत्तर दें।’’ 5. ‘‘उपासकों को अपने मुखारविन्द से आपका निर्मल धर्म सीखने को मिले!’’ 6. तथागत ने अपने उपासकों के प्रति अनुकम्पा करते हुए कहा, ‘‘ध्यान से सुनो। मैं

सदाचरण के सिद्धान्तों की व्याख्या करूँगा। सुनो और उनका अनुसरण करो।’’ 7. ‘‘वध मत करो, न मृत्यु-दण्ड दो, और न बलि का अनुमोदन करो। सबल या

दुर्बल कैसा भी प्राणी हो उसकी हिंसा न करो।’’

  1. ‘‘कोई भी उपासक, जान-बूझ कर, न चोरी करे, न चोरी कराए, या न किसी

चोरी का अनुमोदन करें - केवल वही ले जो दूसरे दें।’’ ‘‘व्यभिचार से दूर

रहे, जैसे वह अग्नि का कुण्ड है, या संयम के अभाव में भी किसी विवाहित

पत्नी से संसर्ग न करे।’’

  1. ‘‘सभाओं, न्यायालयों, या बात-चीत में झूठ न बोले, न झूठ बोलनेंके लिये

प्रेरित या अनुमोदन करें - वह झूठ का परित्याग कर दे।’’

  1. ‘‘गृहस्थों! इस नियमों का पालन करोः नशीले द्रव्य से बचकर रहो_ किसी

को नशीले द्रव्य पीने मत दो, नशीले द्रव्य पीने का अनुमोदन मत करो। देखो

कि नशीले द्रव्य पागलपन की ओर कैसे ले जाते हैं।’’

  1. ‘‘नशीले द्रव्य के द्वारा मूर्ख पाप करते हैं और लापरवाह लोगों को पाप के लिये

उकसाते हैं। अतः इस पागल बनाने वाले व्यसन का, इस मूर्खता का, इस मूर्खों

के स्वर्ग का परित्याग करें।’’

  1. ‘‘न प्राणि हिंसा करो, न चोरी करो, न झूठ बोलो, नशीले द्रव्यों से दूर रहो,

विषयासक्ति से विरत रहो, रात में विकाल भोजन न करो।’’ 14. ‘‘सुगन्धों और फूल-मालाओं से दूर रहें, अपनी शैय्या ऊंची शुद्ध मन से इस

आष्टांगिक व्रत का पालन करें’’