364 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘प्रातः काल इन व्रतों को ग्रहण करें, शुद्ध और श्रद्धायुक्त चित्त से सामर्थ्य भर
भिक्षुओं को भोजन व पेय पदार्थ दान करें।’’
- ‘‘अपने माता-पिता की भली-भाँति सेवा करें, सदाचारी व्यवस्था अपनायें। इस
प्रकार निष्ठावान उपासक ऊंचे पद तक पहुँच सकेगा।’’
5. सदाचरण के पथ पर चलने के लिये साथी की प्रतीक्षा
अनावश्यक
- ‘‘जिस प्रकार हाथी युद्ध में फेंके गये वाण को सहन करता है, उसी प्रकार
संसार में प्रत्येक बुराई से लिप्त लोगों के दुर्वचनों को मुझे भी सहन करना
चाहिये।’’
- ‘‘सधे होने पर वे उस हाथी को युद्ध में ले जाते हैं_ सधे होने पर राजा उसकी
पीठ पर बैठता है_ सधे होने पर वह प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है जिसे कोई दुर्वचन
उसे विचलित नहीं करते।’’
- अच्छी तरह सधे खच्चर अच्छे होते हैं और प्रसिद्ध कुल के सिन्ध के अश्व
अच्छे होते हैं, निस्सन्देह बलवान हाथी अच्छा होता है_ मनुष्यों में स्व-संयमित
सबसे अच्छा होता है।
- फिर भी ऐसे श्रेष्ठ वाहन भी हमें निर्वाण-पथ पर आगे नहीं ले जा सकते।
हम स्वयं निर्वाण-पथ तक केवल स्व-निर्भर, स्व-संयम द्वारा पहुँच सकते हैं। 5. अप्रमाद में आनन्द मनाओ। अपने विचारों में स्मृति-सम्प्रजन्य युक्त रहो, कभी प्रमाद
न करो। अपने को कुमार्ग से हटाओ, हाथी को दलदल से बाहर निकालो। 6. यदि तुम्हें कोई श्रेष्ठ, दृढ़, बुद्धिमान सह-यात्री मिला है, तो अपनी सम्पूर्ण
चिन्ताओं को छोड़कर एकाग्र हो, उसके साथ प्रसन्नतापूर्वक विचरण करो। 7. यदि तुम्हें सच्चा, बुद्धिमान सह-यात्री नहीं मिला, तो जैसे एक राजा शत्रु के
आगे बढ़ने पर अपनी सीमाओं को छोड़कर जंगल में अकेले हाथी के समान
अकेला ही घूमता है, इसी प्रकार तुम भी अकेले ही अपने मार्ग पर विचरण
करो।
- एकान्त जीवन बेहतर है, क्योंकि मूर्ख साथी अच्छा नहीं हो सकता। अकेले
रहो और कोई पाप-कर्म मत करो, अल्प आवश्यकताओं के साथ अकेले रहो,
एकान्त में रहो, जैसे बलवान हाथी जंगल में एकान्त में भोजन करता है। 9. सभी अकुशल-चेतनाओं का त्याग करें।