5. सदाचरण के पथ पर चलने के लिए साथी की प्रतीक्षा अनावश्यक - Page 394

365

  1. अकुशल चेतनाओं को मिटाने की विधि यह है।

  2. इस संकल्प द्वारा तुम्हें उन्हें मिटाना है, चाहे दूसरे लोग हानिकारक हों, तुम

किसी को हानि नहीं पहुंंचाओगे।

  1. भले ही अन्य लोग हत्या करें, तुम कभी भी हत्या नहीं करोगे।

  2. भले ही अन्य लोग चोरी करें, तुम नहीं करोगे।

  3. भले ही अन्य लोग पवित्र-जीवन व्यतीत न करें, तुम करोगे।

  4. भले ही अन्य लोग झूठ बोलें, निन्दा करें, दोषारोपण करें या बकबक करें, तुम

नहीं करोगे।

  1. भले ही अन्य लोग लोभी हों, तुम लोभ नहीं करोगे।

  2. भले ही अन्य लोग द्वेषी हो, तुम दयालु रहोगे।

  3. भले ही अन्य लोग मिथ्या-दृष्टि, मिथ्या-संकल्प, मिथ्या-वाणी, मिथ्या-कर्म,

मिथ्या-आजीविका, मिथ्या-व्यायाम, मिथ्या-स्मृति और मिथ्या-समाधि का

पालन करें, तुम सम्यक्-दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यक्-वाणी, सम्यक्-कर्म,

सम्यक्-आजीविका, सम्यक्-व्यायाम, सम्यक्-स्मृति और सम्यक्-समाधि, के

आर्य आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करोगे।

  1. भले ही अन्य लोग (आर्य) सत्यों और मुक्ति के विषय में गलत हों, तुम आर्य

सत्यों और मुक्ति के विषय में उचित रहोगे।

  1. भले ही अन्य लोग आलस्य और निष्क्रियता से ग्रस्त हों, तुम अपने को उनसे

मुक्त करोगे।

  1. भले ही अन्य लोग अति प्रशंसा से फूले हों, तुम विनम्र रहोगे।
  2. भले ही अन्य लोग विचिकित्सा-युक्त या भ्रान्तियों से किंकर्त्तव्यविमूढ़ हों, तुम

उनसे मुक्त रहोगे।

  1. भले ही अन्य लोग क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, जलन, कृपणता, धनलोलुपता, ढ़ोंग धोखा,

उद्दण्डता, घमण्ड, ढिठाई, अनैतिकता, अशिक्षा, अकर्मन्यता, किंकत्तव्यविमूढ़ता

और मूर्खता को मन में रखें-तुम इन सभी बातों के विपरीत रहोगे।