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2. निर्वाण के मूलाधार
- एक बार भदन्त राध स्थविर तथागत के पास आये। आकर उन्होंने तथागत का
अभिवादन किया और एक ओर बैठ गये। इस प्रकार बैठे हुए भदन्त राध ने
तथागत को इस प्रकार सम्बोधित किया, ‘‘भगवान! निर्वाण किस लिये है।’’ 2. भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘निर्वाण का तात्पर्य राग-द्वेष से मुक्ति।’’ 3. ‘‘किन्तु भगवान्, निर्वाण का क्या उद्देश्य है?’’
- ‘‘राध! निर्वाण में सुस्थित हो, सदाचरण का जीवन व्यतीत किया जाता है।
निर्वाण ही इसका लक्ष्य है। निर्वाण ही इसका साध्य है।’’
(ii)
- एक बार तथागत श्रावस्ती ने अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में विहार कर रहे
थे। तब तथागत ने यह कहते हुए, भिक्षुओं को बुलाया, ‘भिक्षुओ!‘हाँ’ भगवान!’
उन भिक्षुओं ने तथागत को प्रत्युत्तर दिया। तब तथागत ने इस प्रकार कहाः 2. ‘‘भिक्षुओ! क्या तुम्हें मेरे द्वारा उपदेशित उन पाँच बन्धनों का ध्यान है, जो
आदमी को नीचे की ओर घसीट ले जाते हैं।’’
इस पर भदन्त मालुंक्य-पुत्र ने यह कहाः
‘‘भगवान्! मुझे उन पाँच बन्धनों का ध्यान है।’’
‘‘मालुंक्य-पुत्र! तुम्हें उनका ध्यान कैसे हैं?’’
‘‘मुझे ध्यान है भगवान्! जैसा कि तथागत द्वारा उपदेशित किया गया है, कि (छोटे
बालक को) सक्काय-दिट्ठि (शरीरात्मक-दृष्टि), विचिकित्सा, शील-व्रतों पर
निर्भर रहने की दृष्टि और अनुष्कार पर आधारित मानसिक, विकृति, काम-भोगों
की उत्तेजना ओर विद्वेष-तथागत द्वारा उपदेशित बंधन हैं, जो नीचे की ओर
घसीट ले जाते हैं। भगवान् इन पाँच बन्धनों का मुझे ध्यान है।’’ 7. ‘‘किसके लिये मालुक्य-पुत्र! उपदेशित पाँच बंन्धन हैं जिनका तुम्हें ध्यान है?
क्या अन्य मतों के परिव्राजक एक छोटे बच्चे के दृष्टान्त का उपयोग करते हुए
और इस प्रकार कहते हुए तुम्हारी निन्दा नहीं करेंगे।’’
- ‘‘किन्तु, मालुंक्य-पुत्र! अबोध और पीठ के बल लेटे हुए बालक की काया भी
अभी अविकसित है। तब, उसके भीतर सक्काय-दिट्ठी उत्पन्न कैसे हो सकती
हैं? फिर भी निस्सन्देह उसमें सक्काय-दिट्ठी का अंकुर तो निहित है।’’ 9. ‘‘इसी प्रकार मालुंक्य-पुत्र! अबोध और पीठ के बल लेटे हुए एक छोटे बालक