368 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
की मानसिक अवस्थायें ही अविकसित हैं। तब, उसके भीतर मानसिक अवस्थाओं
की विचिकित्सा कैसे हो सकती है? फिर भी उसके भीतर विचिकित्सा का
अंकुर निहित है।’’
- ‘‘इसी प्रकार, मालुंक्य-पुत्र! अभी उसकी मानसिक क्रिया ही नहीं हो सकती
है। तब उसके भीतर धार्मिक कृत्य और अनुष्ठान पर आधारित मानसिक विकृति
कैसे हो सकती है? फिर भी वहाँ उसमें यह प्रवृत्ति निहित है।’’ 11. ‘‘आगे भी मालुंक्य-पुत्र! उस अबोध बालक में इन्द्रियजन्य राग ही नहीं हैं। तब,
काम-भोगों की उत्तेजना कैसे जानी जा सकती है? किन्तु वहाँ प्रवृत्ति निहित
है।’’
- ‘‘अन्त में, मालुंक्य-पुत्र! इस अबोध बालक के लिये प्राणियों का कोई अस्तित्व
ही नहीं है। तब वह प्राणियों के विरुद्ध विद्वेष मन में कैसे रख सकता है, फिर
भी इस प्रवृत्ति का अंकुर तो उसके भीतर है।’’
- ‘‘अब, मालुंक्य-पुत्र! क्या अन्य मतों के वे परिव्राजक एक छोटे बालक के
दृष्टान्त का उपयोग करते हुए इस प्रकार तुम्हारी निन्दा नहीं करेंगे।’’ 14. जब यह कहा जा चुका, तब भदन्त आनन्द ने इस प्रकार तथागत को सम्बोधित
किया, ‘‘अब समय है, तथागत! हे सुगत! अब तथागत के लिये विश्राम करने
का समय है।’’