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परिच्छेद - पाँच
धम्म सम्बन्धी प्रवचन
1. सम्यक् - दृष्टि का पहला स्थान क्यों हैं?
आर्य आष्टांगिक मार्ग में सम्यक्-दृष्टि श्रेष्ठतम है।
सम्यक्-दृष्टि, श्रेष्ठ जीवन की सभी बातों की भूमिका है और कूंजी है।
विवेकहीनता सभी बुराइयों की जड़ है।
सम्यक्-दृष्टि के विकास के लिये आवश्यक है कि मनुष्य को जीवन की
प्रत्येक घटना को प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत की प्रक्रिया के रूप में देखना
चाहिए। सम्यक-दृष्टि रखने का तात्पर्य है कि कारण-कार्य के सिद्धांत के आधार
समझना।
- ‘‘भिक्षुओ! जो कोई भी मनुष्य मिथ्या-दृष्टि, मिथ्या-संकल्प, मिथ्या-वाणी,
मिथ्या-कर्म, मिथ्या-आजीविका, मिथ्या-व्यायाम, मिथ्या-स्मृति और मिथ्या-समाधि
का अनुसरण करता है, उसका ज्ञान और विमुक्ति मिथ्या रहती है। ऐसी मिथ्या
दृष्टि के अनुरूप किये जाने या प्राप्त किये जाने के कारण_ उसके प्रत्येक
कर्म, वचन या विचार, प्रत्येक चेतना, प्रत्येक आकांक्षा, प्रत्येक निश्चय, उसकी
प्रत्येक प्रक्रियाएँ, ये सभी बातें उसे ऐसी स्थिति की ओर ले जाती हैं, जो
अरुचिकर, अप्रीतिकर, घृणास्पद, अलाभप्रद और दुखद होती हैं। ऐसा क्यों?
उसकी मिथ्या-दृष्टि के कारण।’’
- ठीक आचरण होना ही पर्याप्त नहीं है। एक बच्चा ठीक हो सकता है, किन्तु
इसका यह अर्थ नहीं है कि वह बच्चा जानता है, क्या ठीक है। ठीक होने के
लिये मनुष्य को इसका ज्ञान होना चाहिये कि क्या ठीक है? 7. ‘‘आनन्द! यथार्थ भिक्षु किसको कहते हैं? यथार्थ भिक्षु के रूप में किसे व्याख्यित
किया जा सकता है? केवल उसी को जिसने इसमें प्रवीणता पा ली हो कि क्या
विवेकपूर्ण संभव है और क्या अविवेकपूर्ण असंभव है।’’
2. मरणोपरान्त जीवन की चिन्ता क्यों?
- एक समय भदन्त महाकाश्यप और भदन्त सारिपुत्र बनारस के समीप इसिपतन
के मृगदाव में ठहरे हुए थे।