7. आरंभिक प्रवृत्तियां - Page 40

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6. बचपन और शिक्षा

  1. जब सिद्धार्थ चलने और बोलने योग्य हो गया तो शाक्यों के वरिष्ठ जन एकत्रित

हुए और उन्होंने शुद्धोदन से कहा कि बालक को ग्राम देवी अभया के मंदिर

में ले जाना चाहिए।

  1. शुद्धोदन ने स्वीकार किया और उन्होंने महाप्रजापति से बालक को कपड़े पहनाने

को कहा।

  1. जब वह बालक सिद्धार्थ को कपड़ा पहना रही थी तब बालक ने अत्यंत मधुर

वाणी में अपनी मौसी से पूछा कि उसे कहां ले जाया जा रहा है? जब उसे

मालूम हुआ कि उसे मंदिर ले जाया जा रहा है, तो वह मुस्कराया। लेकिन

शाक्यों के रीति-रिवाज के अनुरूप वह मंदिर गया।

  1. आठ वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने अपनी शिक्षा आरंभ की।

  2. जिन आठ ब्राह्मणों को शुद्धोदन ने महामाया के स्वप्न की व्याख्या करने के

लिए बुलाया था और जिन्होंने उसके बारे में भविष्यवाणी की थी, वे ही उसके

प्रथम आचार्य हुए।

  1. जो कुछ भी वे जानते थे, उतना उसे पढ़ा देने के बाद शुद्धोदन ने उदिक्क

देश के उच्च कुल के प्रतिष्ठित विद्वान, भाषाविद और वैयाकरण, वेद-वेदांग

और उपनिषदों में निपुण सब्बमित्त को बुलवाया। उनके हाथ में स्वर्ण कलश

से समर्पण का जल डालकर शुद्धोदन ने उसे पढ़ाने के लिए उनको सौंप दिया।

वह उसका दूसरा आचार्य था।

  1. उसके अधीन गौतम ने उस समय के सभी दर्शन और शास्त्रों में निपुणता प्राप्त

की।

  1. इसके अतिरिक्त उसने भारद्वाज से एकाग्रता और समाधि का ज्ञान प्राप्त किया।

भारद्वाज आलार कालाम का शिष्य था, जिसका कपिलवस्तु में ही आश्रम

था।

7. आरंभिक प्रवृत्तियाँ

  1. जब भी वह अपने पिता के खेतों पर जाता और जब वहाँ कोई काम नहीं रहता,

तब वह एकांत स्थान में ध्यान का अभ्यास करता था।

  1. उसके मानसिक विकास के लिए सभी प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था की गई थी और

क्षत्रिय के अनुरूप सैन्य कला की शिक्षा की भी अवहेलना नहीं की गई थी।