12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- शुद्धोदन को यह चिंता थी कि कहीं ऐसा न हो कि उसके पुत्र में मानसिक
गुणों के ही विकास हों और वह पौरुष में पिछड़ जाए।
- सिद्धार्थ स्वभाव से ही कारुणिक था। उसे यह पसंद नहीं था कि एक आदमी
दूसरे आदमी का शोषण करे।
- एक बार वह अपने मित्रों के साथ अपने पिता के खेतों में गया और वहाँ उसने
मजदूरों को खेत जोतते, बाँध बनाते और वृक्ष काटते हुए देखा। वे तेज धूप में
बहुत कम कपड़े पहने ही काम कर रहे थे।
उस दृश्य का उसके मन पर बहुत प्रभाव पड़ा और द्रवित हो उठा।
उसने अपने मित्रों से कहा कि क्या यह उचित है कि एक आदमी दूसरे आदमी
का शोषण करे? यह कैसे सही हो सकता है कि मजदूर मेहनत करे और
मालिक उसकी मजदूरी पर ऐश करे।
- उसके मित्र नहीं जानते थे कि इसका क्या उत्तर दिया जाए, क्योंकि वे जीवन
की पुरानी विचार-परम्परा में विश्वास रखते थे कि मजदूर का जन्म सेवा करने
के लिए होता है और अपने मालिक की सेवा करना ही उसकी नियति है।
- शाक्य लोग वप्रमंगल नामक एक उत्सव मनाया करते थे, जो खेत बोने के प्रथम
दिन मनाया जाने वाला यह एक ग्रामीण उत्सव था। प्रथा के अनुसार उस दिन
प्रत्येक शाक्य को अपने हाथों से हल चलाना पड़ता था।
- सिद्धार्थ हमेशा इस प्रथा का पालन करता था और हल चलाने में अपने आपको
व्यस्त रखता था।
यद्यपि वह एक विज्ञ पुरुष था, फिर भी शारीरिक श्रम से उसे घृणा नहीं थी।
वह योद्धा (क्षत्रिय) वर्ग से था और उसे धनुष चलाने और शस्त्रों का प्रयोग
सिखाया गया था, लेकिन अनावश्यक रूप से किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाना
उसे अच्छा नहीं लगता था।
- वह शिकारियों के दल के साथ जाने से इंकार कर देता था। उसके मित्रगण
उसे कहा करते थे-‘‘तुम बाघों से डरते हो?’’ वह यह कहते हुए जवाब दिया
करता था-‘‘मैं जानता हूं कि तुम बाघों को मारने नहीं जा रहे हो, तुम हिरन
और खरगोशों जैसे निरीह प्राणियों को मारने जा रहे हो।’’
- ‘‘शिकार के लिए न सही, कम से कम अपने दोस्तों का अचूक निशाना तो
देखने आओ’’ वे कहते थे। इस तरह के निमंत्रणों को भी सिद्धार्थ यह कहते