- ‘‘वासेट्ठ! यह निश्चित है कि ऐसा हो नहीं सकता कि प्रार्थनाओं, याचनाओं
करने, आशाओं करने और स्तुति करने के कारण ये ब्राह्मण अपनी मृत्यु के बाद
ब्रह्म में लीन हो जायें। वस्तुओं की ऐसी अवस्था किसी भी तरह के निश्चय
से नहीं हो सकती।’’
4. मनुष्य का भोजन उसे ‘पवित्र’ नहीं बनाता
- एक ब्राह्मण संयोग से तथागत से मिला और उसने प्रश्न उठाया कि क्या भोजन
का प्रभाव एक मनुष्य के चरित्र पर पड़ता है या नहीं?
- ब्राह्मण ने कहा, ‘‘जौ, गिरी, दालें, कंद, और कोपलें-यदि यह भोजन ठीक से
मिले, सदैव अच्छे जीवन को प्रोत्साहित करता है। ‘मुर्दार माँस’ पर खाना खराब
है?’’
- ‘‘भगवान्! यद्यपि आप कहते हैं कि आप सड़े-गले माँस को छूते नहीं, फिर
भी आप पक्षियों के माँस का बना एक से एक अच्छा भोजन लेते हैं-मैं पूछता
हूँ आप ‘मुर्दा माँस’ किसे कहते हैं।’’
- तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘प्राणी की हत्या करना और अंग-भंग करना, कोड़े
मारना, बाँधना, चोरी, झूठ, ठगी, धोखा और व्यभिचार करना ये माँस-भोजन
नहीं, बल्कि ये मुर्दा-माँस के समान हैं।’’
- ‘‘काम-भोगों का पीछा करना, खाने का लोभ, अपवित्र जीवन, वैर-विरोध
करना, ये माँस भोजन नहीं, बल्कि ये मुर्दा माँस के समान हैं।’’ 6. ‘‘चुगलखोरी, क्रूरता, विश्वासपात, निष्ठुर अभिमान, नीच संतप्तता ये माँस नहीं,
बल्कि ये मुर्दा माँस के समान हैं।’’
- ‘‘क्रोध, अहंकार, विद्रोह, विश्वासघात, ईर्ष्या, डींग मारना, अभिमान, कुसंगति
ये माँस भोजन नहीं, बल्कि ये मुर्दा-माँस के समान हैं।’’
- ‘‘नीच-जीवन, निन्दा करना, धोखा, बेईमानी, धूर्त के दाँव-पेंच, अनुचित बदनामी
माँस भोजन नहीं, बल्कि ये मुर्दा-माँस हैं।’’
- ‘‘ये वध करने और चोरी करने का व्यसन, ये अपराध, ये खतरों भरे नरक के
द्वार हैं- ये सब मुर्दा-मांस नहीं-मांस भोजन नहीं परिपूर्ण है।’’ 10. ‘‘जो आदमी शक्की है, उसका शक माँस और मछली से विरत नहीं किया
जा सकता है, न नग्न रहना, न जटायें, न मुंडे सिर या छाल-वस्त्र, न पवित्र
अग्नि-पूजा, न भावी सुख पाने के लिये की गई कठोर तपस्याएँ, न जल द्वारा