372 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
सफाई, न यज्ञ-हवन और न कोई अनुष्ठान ही।’’
- ‘‘अपनी इन्द्रियों को संयत करो, अपने ऊपर नियन्त्रण रखो, सत्य का आग्रह
रखो और दयावान रहो। जो शान्त पुरुष सभी बन्धनों को तोड़ देता है और
सभी बुराइयों को परास्त करता है, वह भले ही देखे या सुने किसी के द्वारा भी
कलंकित नहीं होता, निर्मल रहता है।’’
- तथागत के इन ऊँचे, सत्य की रक्षा करने, मुर्दा-माँस की निन्दा करने और
बुराइयों को समाप्त करने वाले उपदेश को सुन कर, ब्राह्मण ने विनम्रतापूर्वक
वंदना की और वहीं पर भिक्षु के रूप में प्रव्रजित किये जाने की याचना की।
5. भोजन नहीं, बल्कि कुशल कर्मों का महत्त्व
- आमगन्ध नामक एक ब्राह्मण तपस्वी अपने शिष्यों के साथ हिमालय क्षेत्र में
रहता था।
- वे न तो मछली और न ही माँस खाते थे। प्रत्येक वर्ष वे नमक और खटाई
की तलाश में अपने आश्रम से नीचे उतर आते थे। गाँव के निवासी आदर से
उनका स्वागत करते थे और चार महीने तक उन्हें आतिथ्य प्रदान करते थे। 3. तब तथागत अपने भिक्षुओं सहित उसी गाँव में पहुँचे। लोगों ने तथागत को
धर्मोंपदेश देते सुना, तो वे उनके अनुयायी बन गये।
- उस वर्ष भी आमगन्ध और उनके शिष्य सदा की भाँति गाँव-वासियों के पास
गये, किन्तु गाँव-वासियों ने कोई उत्साह नहीं दिखलाया।
- आमगन्ध को जानकर यह निराशा हुई कि तथागत ने मछली-माँस खाने का
निषेध नहीं किया है। इस विषय को निश्चित करने की इच्छा से, जहाँ तथागत
ठहरे हुए थे, वह श्रावस्ती के जेतवन विहार पहुंचे और कहाः 6. ‘‘जौ, फलियाँ और फल, भोज्य पत्ते और कंद, किसी भी लता पर लगने वाले
फल_ न्यायोचित रूप से प्राप्त किये गये इन पदार्थों को जो सदाचरण से खाता
है, वह सुख भोगों की खातिर झूठ नहीं बोलता।’’
- ‘‘आप दूसरों के द्वारा दिया गया भोजन खाते हैं, जो भली-भाँति तैयार किया
हुआ, अच्छी तरह सजाया_ शुद्ध और उत्तम होता है। वह जो चावल से बने
ऐसे भोजन का आनन्द लेता है, वह ‘आम-गन्ध’ खाता है। आप भली-भाँति
तैयार पक्षी के माँस के साथ चावल खाते हैं और कहते हैं कि आ-मगन्ध का
आरोप, मुझ पर लागू नहीं होता।