374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
देखी और सुनी बातों पर आसक्त नहीं होता।’’
- ‘‘यह अकुशल-कर्म ही हैं, जो ‘आम-गन्ध’ को संघटित करते हैं, मछली और
माँस खाना नहीं।’’
6. बाह्य शुद्धि अपर्याप्त है
- एक बार तथागत श्रावस्ती में विहार कर रहे थे। उस समय संगारव ब्राह्मण भी
वहीं रहता था। वह जल द्वारा शुद्धि मानने वाला था और जल-शुद्धि की प्रक्रिया
करता था। रात-दिन वह प्रायः स्नान करने में ही लगा रहता था। 2. भदन्त आनन्द, प्रातः काल चीवर धारण कर और चीवर व भिक्षा-पात्र लेकर,
भिक्षाटन के लिये श्रावस्ती की ओर निकले। जब उन्होंने श्रावस्ती में अपना
भिक्षाटन कर अपना भोजन ग्रहण कर लिया, अपनी वापसी में, वे तथागत के
पास गये, उनका अभिवादन किया और एक ओर बैठ गये। इस प्रकार बैठे हुए,
भदन्त आनन्द ने कहाः
- ‘‘भगवान्, यहाँ श्रावस्ती में एक संगारव ब्राह्मण रहता है, जो जल द्वारा शुद्धि
करने वाला है, जल द्वारा शुद्धि की क्रिया करता है। रात और दिन वह स्नान
करने में लगा रहता है। भगवान्! यह अच्छा होगा, यदि आप संगारव ब्राह्मण
पर दया कर उससे भेंट करने चलें।’’
और तथागत ने अपने मौन रहकर स्वीकार किया।
अतः दूसरे दिन प्रातः काल, तथागत ने चीवर धारण किया और चीवर व
भिक्षा-पात्र लेकर संगारव ब्राह्मण के निवास पर गये, और जब वे वहाँ पहुँचे,
वे एक बिछे आसन पर बैठ गये।
- तब संगारव ब्राह्मण तथागत के पास आया और उनका अभिवादन किया, और
परस्पर शिष्टाचार के आदान-प्रदान के उपरान्त एक ओर बैठ गया। 7. जब वह इस प्रकार बैठ गया, तथागत ने संगारव ब्राह्मण से यह पूछा, ब्राह्मण!
‘‘क्या यह सत्य है, ब्राह्मण जैसा कि कहते हैं, कि तुम जल द्वारा शुद्धि करने
पर विश्वास करते हो, कि तुम जल द्वारा शुद्धि की क्रिया करते हो, रात और
दिन स्नान करने में लगे रहते हो।’’
‘‘यह सत्य है, श्रमण गौतम!’’
‘‘ब्राह्मण! अब इस प्रकार रात-दिन स्नान करने से तुम क्या लाभ प्राप्त करते
हो?’’
- ‘‘श्रमण गौतम! यह इस तरह है कि जो कुछ भी मैं दिन में पाप करता हूँ,