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उसी शाम को अपने स्नान द्वारा मैं उसे धो डालता हूँ। जो कुछ भी पाप मैं रात
में करता हूँ, सुबह को अपने स्नान द्वारा उसे धो डालता हूँ। यही लाभ दिखाई
देता है, जो मैं जल द्वारा शुद्धि करने में लगा रहता हूँ।’’
तब तथागत ने कहाः
‘‘धम्म ही वह जल-स्रोत है, जो स्वच्छ है और निर्मल है।’’
‘‘यहाँ पर जब शास्त्रों के ज्ञाता स्नान करने आते हैं, तो उनका प्रत्येक अंग शुद्ध
हो जाता है और वे दूसरे तट की ओर चले जाते हैं।’’
- तत्पश्चात् तथागत के ऐसा कहने पर संगारव ब्राह्मण बोला, ‘‘यह अद्भुत है,
श्रमण गौतम! कृपया आज से जीवनपर्यन्त मुझे अपना अनुयायी स्वीकार कर
लें। मुझे अपना शरणागत उपासक जानें।’’
7. पवित्र जीवन क्या है?
- एक बार भगवान बुद्ध ने चारिका करते समय भिक्षुओं को निम्नलिखित उपदेश
दिया-
- भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए तथागत ने कहा, ‘‘हे भिक्षुओं! पवित्र जीवन
का पालन न तो लोगों को ठगने की दृष्टि से, न तो उनसे कुछ पाने के लिये,
न तो लाभ, हित या यश प्राप्ति के उद्देश्य से, न तो विवादों में कठिनाइयों से
बाहर निकलने की मंशा से, न इसलिए कि लोग जान जायें कि यह अमुक
हैं, किया जाता है। निस्सन्देह, भिक्षुओ! इस पवित्र जीवन का पालन शरीर व
वाणी पर संयम रखने के लिये, आस्रवों को शुद्ध करने के लिये और चित्त की
विमुक्ति और तृष्णा के निरोध के लिये किया जाता है।’’