376 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
परिच्छेद - छह
सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों पर प्रवचन
1. राजाओं के अनुग्रह पर निर्भर मत रहो
- एक बार तथागत राजगृह के वेणुवनाराम के कलन्दक-निवास में ठहरे हुए थे।
- उस समय राजकुमार अजातशत्रु देवदत्त का सहायक बना हुआ था, जो भगवान
बुद्ध का विरोधी बन गया था।
- वह पाँच सौ गाडि़यों में पाँच सौ खाने के बर्तनों में सुबह और शाम भोजन
पहुँचाकर देवदत्त के समर्थकों का भरण-पोषण कर रहा था। 4. तब कुछ भिक्षु तथागत के समक्ष आये, उनका अभिवादन किया और एक ओर
बैठे हुए भिक्षुओं ने तथागत को सभी बातें बताईं।
- तब, तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘आप राजाओं से लाभ,
अनुग्रह और खुशामद के लिये लालायित मत हों। जब तक, भिक्षुओ! राजकुमार
अजातशत्रु इस प्रकार पाँच सौ गाडि़यों में पाँच सौ खाने के बर्तनों में लाया गया
भोजन सुबह और शाम पहुँचाकर देवदत्त की सहायता करता है, भिक्षुओ! तब
तक देवदत्त के विषय में यह हानि ही है और स्थिति में लाभ नहीं।’’ 6. ‘‘भिक्षुओ! ठीक जैसे यदि कोई एक पागल कुत्ते की नाक पर कलेजी के टुकड़े
ले जाता है तो कुत्ता और अधिक पागल हो जायेगा, इसी प्रकार, भिक्षुओं, जब
तक राजकुमार अजातशत्रु इस प्रकार देवदत्त की सहायता करता है, देवदत्त के
विषय में अनुमान किया जा सकता है, कि उसकी हानि है, अच्छी स्थिति का
लाभ नहीं। इस प्रकार, भिक्खुओ! राजकुमारों से प्राप्त होने वाले लाभ, अनुग्रह
और खुशामद भयंकर होते हैं।’’
- ‘‘वे निश्चय ही शान्ति-प्राप्ति के मार्ग की बड़ी कटु और दुखद बाधाएं हैं।’’
- ‘‘इसलिए भिक्खुओ! आपको ऐसा अभ्यास डालना चाहिये कि जब हमें राजाओं
से लाभ, अनुग्रह और भेटें मिलेंगी, हम उन्हें अस्वीकार कर देंगे, और जब वे
हम पर आ पड़ेंगे, तो वे हमें जकड़ नहीं पायेंगे और हमारे हृदयों में स्थापित
नहीं हो पायेंगे और हमें राजकुमार के गुलाम नहीं बना पायेंगे।’’
2. यदि राजा सदाचारी होगा, तो उसकी प्रजा भी सदाचारी होगी
- एक बार तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए कहाः