13
हुए अस्वीकार कर देता था- ‘‘मैं निर्दोष पशुओं का वध होते नहीं देखना
चाहता।’’
सिद्धार्थ की इस प्रवृत्ति से प्रजापति गौतमी बहुत चिंतित हो गई।
वह उससे यह कहते हुए तर्क देती-‘‘तुम भूल गए हो कि तुम एक क्षत्रिय हो
और लड़ना तुम्हारा कर्तव्य है। युद्धकला केवल शिकार से ही सीखी जा सकती
है, क्योंकि शिकार से ही तुम सही निशाना लगाना सीख सकते हो। आखेट ही
योद्धा, वर्ग के लिए प्रशिक्षण-भूमि है।’’
- सिद्धार्थ अक्सर गौतमी से पूछा करता-‘‘लेकिन माँ! क्षत्रिय को क्यों लड़ना
चाहिए?’’ और गौतमी उत्तर दिया करती-‘‘क्योंकि यह उसका कर्तव्य है।’’
- सिद्धार्थ उसके उत्तर से कभी संतुष्ट नहीं होता। वह गौतमी से पूछा करता-‘‘अच्छा
मां! यह बताओ, एक आदमी को जान से मारना दूसरे आदमी का कर्तव्य कैसे
हो सकता है?’’ गौतमी तर्क देती-‘‘इस तरह की मनोवृत्ति एक संन्यासी के
लिए ठीक है, लेकिन क्षत्रियों को अवश्य लड़ना चाहिए। यदि वे लड़ेंगे नहीं
तो साम्राज्य की रक्षा कौन करेगा।’’
- ‘‘लेकिन माँ। यदि सभी क्षत्रिय एक दूसरे से प्रेम करें, तो हिंसा के बिना क्या
वे अपने साम्राज्य का संरक्षण नहीं कर सकते?’’ गौतमी को उसे उसके अपने
निर्णय पर छोड़ना पड़ता।
- उसने अपने मित्रों को अपने साथ ध्यान लगाने के लिए प्रेरित करने का प्रयास
किया। उसने उन्हें बैठने का सही ढंग सिखाया। उसने उन्हें किसी एक विषय
पर चित्त को एकाग्र करना सिखाया। उसने उन्हें ऐसे विचार चुनने का परामर्श
दिया जैसे ‘‘मैं प्रभुदित रहूँ, मेरे संबंधी प्रमुदित रहें, सभी जीवित प्राणी प्रभुदित
रहें।’’
- लेकिन उसके मित्र उसकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते थे। वे उस पर हँसते
थे।
- आँखें बंद करने पर वे ध्यान के विषय पर एकाग्र नहीं हो पाते थे। कोई अपनी
आँखों के सामने मारने के लिए हिरण देखते थे या खाने के लिए मिठाइयां।
- उनके माता-पिता को उसका ध्यान लगाना अच्छा नहीं लगता था। वे सोचते थे
कि यह क्षत्रिय जीवन के एकदम विपरीत है।
- सिद्धार्थ को विश्वास था कि ठीक विषय वस्तु पर चित्त एकाग्र करने से व्यापक
मैत्री भावना का विकास होता है। वह यह कहते हुए अपने को न्यायोचित