386 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
जाति-पाँति का संघ में कोई स्थान नहीं था।
सामाजिक-स्थिति का संघ में कोई स्थान नहीं था।
संघ के भीतर सभी सदस्य समान थे।
संघ के भीतर छोटे-बड़े का निर्धारण, योग्यता द्वारा नियंत्रित होता था जन्म
द्वारा नहीं।
- जैसा कि तथागत ने कहा था कि संघ समुद्र के समान है और भिक्षु उन नदियों
के समान हैं, जो समुद्र में गिरकर विलीन हो जाती हैं।
नदी का अपना पृथक नाम और पृथक अस्तित्व होता है।
किन्तु एक बार जब नदी समुद्र में प्रवेश कर जाती है वह अपना पृथक नाम
और पृथक अस्तित्व खो देती है।
वह सब के साथ एक हो जाती हैं।
ऐसी ही स्थिति संघ के साथ है। जब एक भिक्षु संघ में प्रवेश करता है, वह
सब के साथ एक हो जाता है, समुद्र के जल के समान।
- वह अपनी जाति खो देता है। वह अपनी स्थिति खो देता है। ऐसा तथागत ने
कहा था।
- संघ के भीतर जो एकमात्र भिन्नता मानी जाती थी, वह लिंग की थी। अपने
संगठन में भिक्षु संघ, भिक्षुनी संघ से पृथक था।
संघ में प्रवेशक दो वर्गों में विभाजित थेः श्रामणेर और भिक्षु।
बीस वर्ष से कम कोई भी श्रामणेर बन सकता था।
त्रिशरण और दस शीलों को ग्रहण कर एक लड़का एक श्रामणेर बन सकता
है।
- ‘‘मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ, मैं धम्म की शरण जाता हूँ_ और मैं संघ की
शरण जाता हूँ’’-ये त्रिशरण हैं।
- ‘‘मैं प्राणी हिंसा से विरत रहूँगा_ मैं चोरी नहीं करूँगा_ मैं ब्रह्मचर्य का पालन
करूँगा_ मैं झूठ नहीं बोलूँगा_ मैं नशीले पेय-पदार्थों से विरत रहूँगा।’’ 21. ‘‘मैं विकाल-भोजन से विरत रहूँगा_ मैं अनुचित और अनैतिक कार्यों से विरत
रहूँगा_ मैं स्वयं को विभूषित और अलंकृत करने से विरत रहूँगा_ मैं विलासिता
से विरत रहूँगा_ मैं स्वर्ण व रजत के प्रति अनुराग से विरत रहूँगा।’’ 22. ये दस शील हैं।