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- कोई भी एक श्रामणेर किसी भी समय संघ को छोड़ सकता है और एक गृहस्थ
बन सकता है। एक श्रामणेर एक भिक्षु के सानिध्य रहता है और अपना समय
भिक्षु की सेवा में व्यतीत करता है। वह ऐसा मनुष्य नहीं है, जिसने परिव्रजा
ली है।
- एक भिक्षु का पद दो चरणों के उपरान्त प्राप्त होता है। पहला चरण परिव्रजा
कहलाता है और दूसरा चरण उपसम्पदा कहलाता है। उपसम्पदा के पश्चात् ही
वह एक भिक्षु बनता है।
- जो प्रार्थी अन्ततोगत्वा एक भिक्षु बनने की दृष्टि से परिव्रजा ग्रहण करने की इच्छा
रखता है, उसे एक ऐसे भिक्षु की खोज करनी होती है, जिसे एक उपाध्याय
के रूप में कार्य करने का अधिकार हो। एक भिक्षु केवल तभी एक उपाध्याय
बन सकता है, जब उसने कम से कम दस वर्ष एक भिक्षु के रूप में व्यतीत
किए हों।
- ऐसा प्रार्थी यदि उपाध्याय द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वह परिव्राजक
कहलाता है और उसे उपाध्याय की सेवा और संरक्षण में रहना पड़ता है। 27. जब संरक्षण का समय समाप्त होता है, उसके उपाध्याय को ही उपसम्पदा के
उद्देश्य से विशेष तौर पर आयोजित संघ की एक सभा में अपने शिष्य का नाम
प्रस्तावित करना पड़ता है और उपसम्पदा के लिये शिष्य को संघ से निवेदन
करना होता है।
- संघ को संतुष्ट करना पड़ता है कि वह एक भिक्षु बनाये जाने के लिये योग्य
और उपयुक्त व्यक्ति है। इस प्रयोजन के लिए कुछ निश्चित प्रश्न हैं, जिनका
प्राथी को उत्तर देना पड़ता है।
- जब संघ अनुमति प्रदान करता है केवल, तभी उपसम्पदा दी जाती है और व्यक्ति
एक भिक्षु बनता है।
- भिक्षुणी संघ के प्रवेश नियम भी कुछ उनके ही समान हैं जैसे कि भिक्षु संघ
में प्रवेश नियम है।
3. भिक्षु और उसके व्रत
- एक गृहस्थ (उपासक) या एक श्रामणेर शील ग्रहण करता है, उनका पालन
करना उसका कर्त्तव्य है।
- एक भिक्षु शीलों को ग्रहण करने के अलावा उन्हें व्रत के रूप में भी ग्रहण