388 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
करता है, जिन्हें उसे भंग नहीं करना चाहिए। यदि वह उन्हें भंग करता है, तो
वह दण्ड का भागी बन जाता है।
एक भिक्षु ब्रह्मचारी रहने का व्रत लेता है।
एक भिक्षु चोरी न करने का व्रत लेता है।
एक भिक्षु डींग न मारने का व्रत लेता है।
एक भिक्षु हिंसा न करने का व्रत लेता है।
एक भिक्षु किसी भी नियम-ब्राह्य वस्तु का स्वामित्व न ग्रहण करने का व्रत
लेता है।
- किसी भी भिक्षु के पास निम्नलिखित आठ वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ भी नहीं
होना चाहियेः-
(1) अपने शरीर को ढँकने के लिये तीन चीवरः-
(i) अन्दरूनी वस्त्र जो अन्तर-वासक कहलाते हैं।
(ii) ऊपरी वस्त्र जो उत्तरासंघ कहलाता है।
(iii) शीतादि से बचाव के ढंकने वाला वस्त्र जो संघाटी कहलाता है।
(2) कमर कसने के लिए एक पेटी।
(3) एक भिक्षा-पात्र।
(4) एक उस्तरा।
(5) एक सुई।
(6) पानी छानने का वस्त्र।
- एक भिक्षु अभाव (निर्धनता) का व्रत लेता है। उसे अपने भोजन के लिये भिक्षा
अवश्य मांगनी चाहिये। उसे भिक्षाटन पर जीवन व्यतीत करना चाहिए। उसे स्वयं
को एक दिन में केवल एक ही आहार पर जीवित रखना चाहिए। जहाँ संघ के
लिये कोई विहार निर्मित नहीं है, वहां उसे एक वृक्ष के नीचे रहना चाहिए। 10. एक भिक्षु किसी भी व्यक्ति की आज्ञा मानने का व्रत नहीं लेता है। एक श्रामण्
ोर से अपने वरिष्ठ लोगों के प्रति बाह्य सम्मान और शिष्टता की अपेक्षा की
जाती है। उसकी अपनी मुक्ति और एक आचार्य के रूप में उसकी उपयोगिता
उसकी अपनी साधना पर निर्भर करती है। उसे अपने वरिष्ठ भिक्षुओं की नहीं,
बल्कि धम्म की आज्ञा का पालन करना चाहिये। उसके वरिष्ठों के पास न कोई