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अलौकिक प्रज्ञा या क्षमादान का वरदान है। उसका उत्थान या पतन स्वयं अपने
द्वारा होना चाहिए। उसके लिये उसे सोचने की स्वतन्त्रता होनी चाहिये। 11. किसी भिक्षु द्वारा किये गये एक भी व्रत (चार-विशेष व्रत) भंग के कारण वह
पाराजिक का अपराधी बन जाता है। पाराजिक का दण्ड संघ से निष्कासन है।
4. भिक्षु और सांघिक नियम सम्बन्धी अपराध
- किसी भिक्षु द्वारा लिये गये व्रतों को भंग करना ‘धम्म’ के विरुद्ध एक अपराध
है।
- इन अपराधों के अतिरिक्त कुछ अन्य अपराध थे, जिनके प्रति भी वह उत्तरदायी
था, वे संघादिसेस कहलाते थे-सांघिक नियम सम्बन्धी अपराध। 3. विनय-पिटक के अनुसार ऐसे अपराधों की सूची में तेरह अपराध हैं। 4. संघादिसेसों का क्रम वे पाराजिक के बाद है।
5. भिक्षु और सयंम (प्रतिबन्ध)
- इन अपराधों से साफ-साफ बचते हुए चलने के अतिरिक्त भिक्षु को कुछ
प्रतिबन्धों का पालन करना चाहिये और वह दूसरे गृहस्थों के समान स्वतन्त्र
नहीं हो सकता।
- ऐसे प्रतिबन्धों का समूह ‘निस्सगगीय-पाचित्तिय’ कहलाते हैं। इसमें भिक्षु द्वारा
पालन किये जाने वाले 26 प्रतिबन्ध समाहित हैं।
- वे चीवरों, ऊनी बिछावनों, भिक्षा-पात्र और चिकित्सा-सम्बन्धी आवश्यकताओं
की भेंट स्वीकारने से सम्बन्धित हैं।
- वे स्वर्ण व रजत स्वीकार करने से भी सम्बन्धित हैं। वे एक भिक्षु के क्रय-विक्रय
में संलग्न रहने तथा संघ को दी गयी सम्पत्ति को अपना बना लेने से भी संबंधित
हैं।
- इन प्रतिबन्धों को भंग करने का दण्ड ‘निस्सगगीय’ (नैसर्गिक) और ‘पाचित्तिय’
(पश्चाताप) होता है।
- इन प्रतिबन्धों के अतिरिक्त कुछ दूसरे प्रतिबन्ध भी हैं, जिनका भिक्षु को पालन
करना होता है। वे ‘पाचित्त्यि’ कहलाते हैं। उनकी संख्या बानवे है।