2. भिक्षु और तपस्वी - Page 427

398 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

वहीं बैठने वाला, एक मैला-खाने वाला, ऐसी वस्तुओं को खाने की आदत का

शिकार है, वह एक नशीले पेय पदार्थ न पीने वाला है, केवल (ठण्डा पानी)

पीने की आदत का शिकार है_ और यहाँ तक कि दिन में तीन बार स्नान करने

वाला मनुष्य है।’’

  1. इतना कहने के पश्चात्, तथागत ने निग्रोध से पूछा, ‘‘निग्रोध! तुम क्या सोचते

हो, यदि ये सब बातें ऐसी ही हों, क्या स्व-क्लेश की तपस्याएँ पूर्ण हुईं या

ऐसा नहीं हैं?’’ ‘‘वास्तव में तथागत! यदि ये सब बातें ऐसी ही हों, स्व-क्लेश

कारक की तपस्याओं की पूर्ति हो गयी है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! अब मैं निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि इस प्रकार की गयी स्व-क्लेश

की तपस्याओं की पूर्ति में विभिन्न प्रकार के द्वेष समाहित है।’’

  1. ‘‘तथागत! आप किस प्रकार से निश्चयपूर्वक कहते हैं कि द्वोष समाहित

हैं?’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! जब एक मामले में एक तपस्वी तपस्या करता है कि, वह उस

मार्ग के द्वारा उसे झूठा संतोष हो जाता है, कि उसका उद्देश्य पूर्ण हो गया है।

निग्रोध! यह तपस्वी में एक दोष बन जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! जब एक तपस्वी तपस्या है, तो उससे वह समझता है। वह ऊंचा

है और दूसरों को वह नीचा समझता है। यह भी, तपस्वी में एक दोष बन जाता

है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! जब एक तपस्वी तपस्या करता है, तो उसे यह नशा हो जाता है

और वह लापरवाह व मतवाला हो जाता है और असावधान भी हो जाता है यह

भी, तपस्वी में एक दोष बन जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! जब एक तपस्वी तपस्या करता है, तो उसके लिये भेंट, आदर-सत्कार

लाभ और यश उत्पन्न होता है। उसके द्वारा उसे झूठी सन्तुष्टी हो जाती है और

उसका उद्देश्य पूर्ण हो जाता है, यह भी, तपस्वी में एक दोष बन जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! भेंट, आदर-सत्कार और यश प्राप्त कर लेने पर तपस्वी अपने को

ऊंचा व महान और दूसरों को तुच्छ समझता है। यह भी तपस्वी में एक दोष

बन जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! भेंट, आदर-सत्कार और यश प्राप्त कर लेने पर, वह उससे मतवाला

और मोहित बन जाता है और असावधान हो जाता है। यह भी तपस्वी में एक

दोष बन जाता है।’’