2. भिक्षु और तपस्वी - Page 428

399

  1. ‘‘हे निग्रोध! जब तक तपस्वी तपस्या करने लगता है, तो वह भोजन में भेद

करना शुरू कर देता है और वह कहता है यह मेरे लिये अनुकूल है, यह मेरे

लिये प्रतिकूल है, यह मेरे लिये उपयुक्त नहीं है। जिन भोजनों को प्रतिकूल

समझता है, वह उन्हें जानबूझकर त्यागता है। जो उसके अनुकूल होते हैं, उनके

लिए वह लोभी और मुग्ध हो जाता है, और उनमें खतरा न देखकर, उन्हें

असुरक्षित न समझ कर उनसे चिपका रहता है और इस प्रकार उनका आनन्द

लेता है। यह भी तपस्वी में एक दोष बन जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! एक भेंट, आदर-सत्कार और यश के प्रति अपनी लालसा के कारण,

वह सोचता हैः ‘राजा मुझे आदर-सत्कार देंगे और इसलिये उनके मंत्री, अधिकारी

भी देंगे, इसलिए ही, कुलीन, ब्राह्मण, गृहस्थ और संप्रदायों के संस्थापक भी

देंगे।’ यह भी तपस्वी में एक दोष बन जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! एक तपस्वी किसी दूसरे तपस्वी या ब्राह्मण पर बड़बड़ाने लगता

है, यह कहते हुए, ‘वह मनुष्य सभी प्रकार की वस्तुओं पर गुजारा करता है,

कन्द-मूल, या शाखाओं पर लगने वाले फल, या बेर या गाँठें, या बीज उस

सभी को जबड़ों के वर्ष से पीस डालता है-और तब भी लोग उसे धर्मात्मा

कहते हैं। यह भी तपस्वी में एक दोष हो जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! एक तपस्वी देखता है कि किसी दूसरे श्रमण या ब्राह्मण का बहुत

आदर-सत्कार और लाभ प्राप्त हो रहा है, पूजा जा रहा है, सम्मानित हो रहा

है। और नागरिकों द्वारा भेंट दिये जाते देखता है। यह देखकर वह सोचता हैः

‘नागरिक इस मनुष्य को इतना आदर-सत्कार देते हैं, इसलिए वह विलासिता

का जीवन व्यतीत करता है, वे उसे पूजते और सम्मान देते हैं, और उसे भेंट

प्रस्तुत करते हैं, जबकि मुझे, जो मैं एक तपस्वी के रूप में, वास्तव में एक

कठोर तपस्वी का जीवन जीता हूँ, वे कोई आदर-सत्कार नहीं देते हैं, और न

पूजते हैं, न सम्मान करते हैं, न भेंट देते हैं’। और इसलिये वह ईर्ष्या हृदय में

रखता है और नागरिकों के प्रति दुर्भाव रखता है। यह भी तपस्वी में एक दोष

हो जाता है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! तपस्वी रहस्यमय होने का अभिनय करता है। जब पूछा जाता है

कि ‘क्या आप इसको अनुमोदित करते हैं?’ वह अनुमोदित न करते हुए कहता

है कि ‘मैं करता हूँ’ या अनुमोदित करते हुए, कहता है ‘मैं नहीं करता हूँ’। इस

प्रकार वह जानबूझ कर झूठ बोलता है। यह भी तपस्या में एक दोष हो जाता

है।’’

  1. ‘‘हे निग्रोध! तपस्वी क्रोधित हो सकता है और द्वेष भी उत्पन्न कर सकता है।