400 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
यह भी तपस्वी में एक दोष हो जाता है।’’
- ‘‘हे निग्रोध! तपस्वी ढोंगी तथा धूर्त हो सकता है, साथ ही साथ ईष्यालु तथा
बड़बड़ाने वाला हो सकता है। वह चालाक व चालबाज बन जाता है, कठोर-हृदय
व अभिमानी बन जाता है, वह बुरी इच्छायें मन में रखता है और उनका दास
बन जाता है, वह मिथ्या धारणायें मन में रखता है, अनुभवातीत मत से ग्रस्त हो
जाता है, अपने अनुभवों की गलत व्याख्या करता है, वह कंजूस तथा संन्यास
के विरुद्ध है। यह भी तपस्या में एक दोष हो जाता है।’’
- ‘‘इसके विषय में तुम क्या सोचते हो, निग्रोध? क्या ये बातें स्व-क्लेष कर की
तपस्याओं में दोष हैं, या वे नहीं हैं?’’
- ‘‘भगवान! वास्तव में ये बातें स्व-क्लेष की तपस्याओं में दोष हैं। यह सम्भव
है, भगवान्! कि एक तपस्वी यहाँ तक कि इन सभी दोषों से ग्रस्त हो सकता
है, इनमें से किसी एक या दूसरे से अधिक ग्रसित हो सकता है।’’ 30. भिक्षुओं को इन दोषों से ग्रस्त नहीं होना चाहिये।
3. भिक्षु तथा ब्राह्मण
- क्या भिक्षु वैसा ही है जैसा कि ब्राह्मण? इस प्रश्न का उत्तर भी नकारात्मक ही
है।
- इस विषय की चर्चा किसी एक स्थल पर नहीं मिलेगी। यह बुद्ध-वचनों की
सभी जगह बिखरी पड़ी हैं। किन्तु दोनों के अन्तर को सरलता से सार प्रस्तुत
किया जा सकता है।
- एक ब्राह्मण एक पुरोहित होता है। उसका मुख्य कार्य जन्म, विवाह व मृत्यु से
सम्बन्धित कुछ विशेष ‘संस्कारों‘’ को कराना है।
- यह संस्कार इसलिये आवश्यक बन जाते हैं, क्योंकि आत्मा को मूलतः पाप में
लिप्त मानने का सिद्धान्त है, जिसे निर्मल कर निष्पाप बनाने के लिये संस्कारों
की आवश्यकता होती है, और क्योंकि आत्मा व परमात्मा में विश्वास किया
जाता है।
- इन संस्कारों के करने के लिये एक पुरोहित आवश्यक होता है। एक भिक्षु
मूलतः पाप ईश्वर और आत्मा में विश्वास नहीं करता। इसलिए उसे कोई
संस्कार करने-कराने की आवश्यकता नहीं होती। अतः वह एक पुरोहित नहीं
होता है।