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एक ब्राह्मण जन्म लेता है। एक भिक्षु बनता है।
एक ब्राह्मण की एक जाति है। एक भिक्षु की कोई जाति नहीं होती है।
जो एक बार ब्राह्मण पैदा हो गया, वह सदैव के लिये ब्राह्मण हो गया। कोई
भी अपराध कोई भी पाप ब्राह्मण को अपदस्थ नहीं कर सकता। 9. किन्तु जो एक बार भिक्षु बन गया वह सदैव के लिये भिक्षु नहीं रहता। एक
भिक्षु बनता है। यदि अपने आचरण द्वारा वह स्वयं को एक भिक्षु बने रहने के
अयोग्य बना देता है, तो उसे अपदस्थ किया जा सकता है।
- एक ब्राह्मण बनने के लिए कोई मानसिक या नैतिक प्रशिक्षण आवश्यक नहीं
होता है। उससे जिस बात की आशा की जाती है (केवल आशा) वह है अपने
धार्मिक शास्त्र को जानने की।
- भिक्षु का मामला इसके सदैव प्रतिकूल है, मानसिक और नैतिक प्रशिक्षण उसका
जीवन-प्राण है।
- एक ब्राह्मण स्वयं के लिये असीमित सम्पत्ति अर्जित करने के लिये स्वतन्त्र है।
दूसरी ओर एक भिक्षु नहीं कर सकता।
- यह कोई छोटा अन्तर नहीं है। सम्पत्ति और कार्य दोनों के विषय में मनुष्य की
मानसिक ओर नैतिक स्वतंत्रता पर कठोरतम प्रतिबन्ध है। यह दोनों प्रवृत्तियों के
मध्य एक संघर्ष उत्पन्न कर देती है। इसलिये ब्राह्मण ही सदैव परिवर्तन का
विरोधी रहा है। उसके लिये एक परिवर्तन का अर्थ शक्ति की हानि और धन
की हानि है।
- सम्पत्तिविहीन एक भिक्षु मानसिक और नैतिक रूप से स्वतन्त्र है। उसके मामले
में ऐसे कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं हैं, जो ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के मार्ग में
रुकावट बन सके।
- वे ब्राह्मण हैं, फिर भी प्रत्येक ब्राह्मण स्वयं में एक व्यक्ति होता है। ऐसा कोई
धार्मिक संगठन नहीं है, जिसके वह अधीन है। एक ब्राह्मण स्वयं में ही एक
कानून है। वे आपस में सामूहिक भौतिक स्वार्थ से बंधे हैं।
- दूसरी ओर एक भिक्षु सदैव संघ का एक सदस्य रहता है। यह कल्पनातीत है
कि एक भिक्षु संघ का एक सदस्य हुए बिना नहीं हो सकता है। एक भिक्षु
स्वयं में ही एक कानून नहीं है। वह संघ के अधीन है। संघ एक आध्यात्मिक
संगठन है।