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- उस समय पूर्वाह्न में तथागत ने, चीवर धारण कर, चीवर पहन और अपना
पात्र लेकर भिक्षाटन के लिये नगर में प्रवेश किया।
- तथागत ने सोचा ‘‘भिक्षाटन के लिये अनुपिय में जाना अभी मेरे लिए काफी
शीघ्र है। मैं उस विहार-भूमि में थोड़े समय के लिए हूँ, जहाँ भग्गव परिव्राजक
रहते हैं, और उनसे चलकर भेंट करूं।’’
- अतः तथागत विहार-भूमि में उस स्थल पर गये, जहां भग्गव परिव्राजक थे।
- तब भग्गव तथागत से इस प्रकार बोले, ‘‘भगवान्, तथागत पधारें! तथागत आपका
स्वागत है। चिरकाल के उपरांत तथागत ने हमारी ओर आने का अनुकम्पा की
है। आप कृपा करके आसन ग्रहण करें, आपके लिये आसन सुसज्जित है।’’ 6. इस पर तथागत ने आसन ग्रहण किया और भग्गव एक नीचा आसन लेकर
उनकी बगल में बैठ गये। इस प्रकार बैठे हुए भग्गव परिव्राजक ने तथागत से
इस प्रकार कहाः
- ‘‘कुछ दिन पहले, भगवान्! सुनक्खत्त लिच्छवी मेरे पास आया था और इस
प्रकार बोला, ‘मैंने अब तथागत शिष्यत्व त्याग दिया है, भग्गव! मैं अब शिक्षक
के रूप में उनके अधीन नहीं हूँ। क्या यह तथ्य वास्तव में ऐसा ही है?’’ 8. ‘‘यह ठीक ऐसा ही है, भग्गव! जैसे सुनक्खत्त लिच्छवी ने कहा।’’ 9. ‘‘कुछ दिन पहले, भग्गव, काफी दिनों पहले, सुनक्खत्त लिच्छवी मेरे पास आया
था और इस प्रकार बोला, ‘मैं अब तथागत का शिष्यत्व त्याग करता हूँ, अब
से मैं एक शिष्य के रूप में तथागत के अधीन नहीं रहूँगा।’ जब उसने मुझसे
यह कहा, तो मैंने उससे कहा, ‘किन्तु, अब सुनक्खत्त क्या मैंने कभी तुमसे यह
कहा था- ‘आओ सुनक्खत्त! मेरे अधीन एक शिष्य के रूप में रहो?’’’ 10. ‘‘नहीं, तथागत आपने नहीं कहा, सुनक्खत्त ने उत्तर दिया।’’ 11. ‘‘या तूने कभी मुझसे कहा था ‘कि मैं तथागत को अपना गुरु स्वीकार करता
हूं।’’
‘‘नहीं, तथागत! मैंने ऐसा नहीं कहा, सुनक्खत्त ने कहा।’’
‘‘किन्तु यदि मैंने ऐसा नहीं कहा और तुमने भी वैसा नहीं कहा तो तुम क्या
हो और मैं क्या हूँ कि तुम मुझे त्यागने की बात करते हो?’’ 14. ‘‘यही सही, किन्तु तथागत आप मुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे कोई
चमत्कार (प्रातिहार्य) नहीं दिखाते हैं।’’
- ‘‘क्यों सुनक्खत्त! क्या मैंने तुमसे कभी कहा था, ‘आओ मुझे अपने गुरु के रूप