2. चमत्कारों (प्रतिहार्यों) द्वारा धम-दीक्षा नहीं - Page 437

408 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

में स्वीकार करो, सुनक्खत्त! मैं सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे कोई प्रतिहार्य

तुम्हें दिखाऊंगा?’’

  1. ‘‘आपने नहीं कहा, भगवान्।’’

  2. ‘‘या तुमने कभी मुझसे कहा था, कि मैं तथागत को अपने गुरु के रूप में

स्वीकार करने को तैयार हूँ, क्योंकि वे मुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे

कोई प्रातिहार्य दिखायेंगे?’’

  1. ‘‘मैंने ऐसा नहीं कहा, भगवान्।’

  2. ‘‘किन्तु यदि मैंने ऐसा नही कहा और तुमने भी वैसा नहीं कहा, तो तुम क्या हो

और मैं क्या हूँ, मूर्ख कि तुम मुझे त्यागने की बात करते हो? तुम क्या सोचते

हो, सुनक्खत्त?’’

  1. ‘‘चाहे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे प्रातिहार्य दिखाये जायें, या भले ही वे

न दिखाये जायें, यह वह उद्देश्य नहीं है, जिसके लिये मैं धम्म का उपदेश देता

हूँ, बल्कि इसलिये कि यह इसका अनुसरण करने वाले को दुःख के सम्पूर्ण

नाश की ओर ले जाता है?’’

  1. ‘‘भले ही भगवान्! वे दिखाये जायें या नहीं, निश्चय ही यही वह उद्देश्य है

जिसके लिये तथागत द्वारा धम्म का उपदेश दिया गया है।’’ 22. ‘‘किन्तु भग्गव! सुनक्खत्त मुझसे कह रहा, ‘तथागत मेरे समक्ष सृष्टि का आरम्भ

प्रकट नहीं करते है।’’

  1. ‘‘क्यों सुनक्खत्त! क्या मैंने कभी तुमसे कहा था, ‘आओ सुनक्खत्त! मेरे शिष्य

बनो और मैं तुम्हारे सामने सृष्टि का आरम्भ प्रकट करूंगा?’’’ 24. ‘‘भगवान्! आपने नहीं कहा।’’

  1. ‘‘या कभी तुमने मुझसे कहा था, ‘मैं तथागत का शिष्य बनूंगा, क्योंकि तथागत

मेरे समक्ष सृष्टि का आरम्भ प्रकट करेंगे’?’’

  1. ‘‘भगवान्! मैंने नहीं कहा।’’

  2. ‘‘किन्तु यदि मैंने ऐसा नहीं कहा, और तुमने भी वैसा नहीं कहा, तो तुम क्या

हो और मैं क्या हूँ, मूर्ख मनुष्य कि तुम उस आधार पर मुझे त्यागने की बात

करते हो? तुम क्या सोचते हो, सुनक्खत्त? भले ही सृष्टि का आरम्भ प्रकट किया

जाये, या भले ही वह न किया जाये, क्या यह वह उद्देश्य है, जिसके लिये मैं

धम्म का उपदेश देता हूँ, नहीं, बल्कि इसलिये कि यह इसका अनुसरण करने

वाले को दुख के सम्पूर्ण नाश की ओर ले जाता है?’’