3. जोर-जबर्दस्ती से धर्मान्तरण नहीं - Page 438

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  1. ‘‘भले ही भगवान्! वे प्रकट किये जायें या नहीं, निश्चय ही यही वह उद्देश्य

है, जिसके लिये तथागत द्वारा धम्म का उपदेश दिया गया है।’’ 29. ‘‘तब, सुनक्खत्त! इससे उस उद्देश्य पर कोई अन्तर नहीं पड़ता कि भले ही सृष्टि

का प्रारम्भ प्रकट किया गया है, या भले ही यह नहीं प्रकट किया गया, यह

तुम्हारे किस प्रयोजन का है कि सृष्टि के प्रारम्भ को प्रकट किया जाये?’’ 30. ‘‘सुनक्खत्त! विभिन्न प्रकार से तुमने वज्जियों के मध्य मेरी प्रशंसा की है।’’ 31. ‘‘सुनक्खत्त! विभिन्न प्रकार से तुमने वज्जियों के मध्य धम्म की प्रशंसा की

है।’’

  1. ‘‘सुनक्खत्त विभिन्न प्रकार से तुमने वज्जियों के मध्य संघ की प्रशंसा की

है।’’

  1. ‘‘सुनक्खत्त! मैं तुम्हें बताता हूँ, मैं तुम्हें ज्ञात कराता हूँ, कि ऐसे लोग भी होंगे,

जो तुम्हारे विषय में इस प्रकार कहेंगेः ‘सुनक्खत्त लिच्छवी श्रमण गौतम के

अधीन पवित्र जीवन जीने के योग्य नहीं था और इसलिए उसने इसका अनुशासन

को त्याग दिया और निम्न वस्तुओं की ओर मुड़ गया।’’

  1. ‘‘हे भग्गव! इस प्रकार सुनक्खत्त लिच्छवी मेरे बाद इस धर्म और विनय को

त्याग गया, जैसे कोई सर्वनाश को प्राप्त हो गया।’’

  1. ‘‘और कुछ ही समय उपरान्त, बुद्ध के धम्म और विनय को त्याग कर, सुनक्खत्त

ने लोगों से कहना प्रारम्भ कर दिया कि बुद्ध के ज्ञान और अन्तर्दृष्टि के परिष्कृत

करने वाली भेटों के विषय में कुछ भी अलौकिक नहीं था, कि यह उनकी

स्वयं की समझ थी, जिसने उनकी अपनी बोधि और उनकी अपनी व्यक्तिगत

खोज को एक सिद्धांत का रूप दिया था, इस प्रकार कि उसे जो कोई सुनता है

जो केवल उसके भले के लिये उपदेशित किया गया है उसको इसके अनुसार

पालन करना होता है जो दुख के सम्पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है।’’ 36. यद्यपि, सुनक्खत्त बुद्ध की निन्दा कर रहा था, वह जो लोगों को कह रहा था

सच था। क्योंकि बुद्ध ने अपने धम्म के प्रचार में अलौकिक या चमत्कार का

कभी आश्रय नहीं लिया था।

3. जोर-जबर्दस्ती से धम्म-दीक्षा नहीं

  1. एक बार लगभग पांच सौ भिक्षुओं के साथ तथागत राजगृह और नालन्दा के

मध्य राजमार्ग से चले जा रहे थे और सुप्पिय परिव्राजक भी अपने शिष्य युवक

ब्रह्मरूप के साथ राजगृह और नालन्दा के मध्य राजमार्ग से जा रहा था।