410 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- उस समय सुप्पिय परिव्राजक विभिन्न प्रकार से बुद्ध की निन्दा में, धम्म की
निन्दा में और संघ की निन्दा में बोल रहा था। किन्तु उसके तरुण शिष्य ब्रह्मदत्त
ने विभिन्न प्रकार से, बुद्ध की प्रशंसा में, धम्म की प्रशंसा में, और संघ की
प्रशंसा में उद्गार व्यक्ति किये।
- इस प्रकार वे दोनों, गुरु और शिष्य, एक दूसरे के परस्पर-विरोधी मतों को
धारण किये हुए उनके कदम-दर-कदम, तथागत और भिक्षु संघ के पीछे-पीछे
चले आ रहे थे।
- तथागत और उनके साथ भिक्षु संघ अब रात गुजारने के लिये अम्बलट्ठि राजकीय
उद्यान में ठहरे और वैसा ही सुप्पिय परिव्राजिक और उसके साथ उसके युवक
शिष्य ब्रह्मदत्त ने भी किया। और वहां, राजौघान में, वे पहले के समान उसी
विवाद को जारी रखे रहे।
- और प्रातः काल कुछ भिक्षु एकत्रित हुए, जब वे सोकर उठे, मंडप के भीतर
और जो बातचीत का विषय उनके मध्य उठ खड़ा हुआ वह सुप्पिय और ब्रह्मदत्त
का संवाद था।
- अब तथागत, यह समझकर कि उनकी चर्चा का क्या तात्पर्य था, मण्डप में
गये, और अपने लिये बिछे आसन पर अपना स्थान ग्रहण किया। जब वे बैठ
गये तो भगवान ने कहा, ‘‘वह चर्चा क्या है? जिस पर आप लोग यहां बैठ कर
उलझे हुए हैं और आप लोगों के मध्य संवाद का क्या विषय है? उन लोगों ने
तथागत को सब कुछ बता दिया भगवान् तो कहाः
- ‘‘भिक्षुओ! यदि बाहरी लोग मेरे विरुद्ध, धम्म के विरुद्ध, या संघ के विरुद्ध
कुछ कहते हैं, आप लोगों को उस आधार पर न तो दुर्भाव रखना चाहिए, न
मन में जलन रखनी चाहिये और न ही बुरा अनुभव करना चाहिये।’’
- ‘‘यदि तुम, उस आधार पर, क्रोधित और आहत होते हो, तो इससे तुम्हारी ही
हानि होती है। यदि उस पर तुम क्रोधित होते हो, और नाराज होते हो। क्या तुम
यह निर्णय करने में सक्षम हो कि उनका कथन किस सीमा तक ठीक है या
गलत?’’
‘‘वह ऐसा नहीं हो पायेगा, भगवान्!’’
‘‘किन्तु जब बाहरी लोग मेरी या धम्म की, या संघ की निन्दा में बोलें, तो जो
बात गलत है उसे सुलझाना चाहिये और उसे गलत कहते हुए निर्देशित करना
चाहिये कि इस या उस कारण से यह तथ्य नहीं है, यह ऐसा नहीं है, ऐसी
कोई बात हमारे मध्य नहीं पायी जाती है, यह हम में नहीं है।’’