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ही लागू होने के लिये आवश्यक था। जो कुछ उपदेश दिए गए थे वे दोनों पर
लागू होते थे।
- जिस समय उन्होंने (i) पंचशील ( ii ) आष्टांगिक मार्ग और ( iii ) पारमिताओं
का उपदेश दिया, तो उनकी नजर उपासकों पर ही रही होगी, जैसा कि यह
उनकी प्रकृति से ही पर्याप्त स्पष्ट है और वास्तव में कहें, तो किसी भी तर्क
की आवश्यकता नहीं है।
- जिन्होंने अपने गृहों का त्याग नहीं किया और जो सक्रिय जीवन में संलग्न हैं
उनके लिये पंचशील, आष्टांगिक मार्ग और पारमितायें अनिवार्य हैं। यह वे हैं, जो
संभवतः उनका उल्लंघन करते हैं न कि भिक्षु जिन्होंने गृह-त्याग कर दिया है, जो
सक्रिय जीवन में संलग्न नहीं हैं और संभवतः वे उनका उल्लंघन नहीं करेंगे। 10. इसलिये, जब बुद्ध ने अपने धम्म का प्रचार प्रारम्भ किया, तो वह नियमतः
उपासकों के लिये ही रहा होगा।
- यद्यपि केवल यह अनुमान पर निर्भर करना आवश्यक नहीं है। आलोचना का
खण्डन करने के लिये प्रत्यक्ष साक्ष्य भी है।
निम्नलिखित प्रवचन का उल्लेख किया जा सकता हैः-
एक बार जब तथागत श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे,
वहाँ पाँच सौ अन्य उपासकों के साथ उपासक धम्मिक आया, जिसने यथोचित
अभिवादन के पश्चात् एक ओर आसन ग्रहण किया तथा तथागत को इस प्रकार
सम्बोधित कियाः
- ‘‘हे तथागत! कौन से शील परिशुद्ध करते हैं, दोनों को वे जो भिक्षु हैं और वे
जो केवल उपासक हैं, अर्थात् वे जो बेघर है और वे जो बेघर नहीं हैं।’’ 15. ‘‘भगवान्! उपासकों सहित उपस्थित भिक्षुओं को अपने-अपने ‘शील’ की
जानकारी देने की कृपा करें।’’
- तथागत बोले, ‘‘भिक्षुओ! ध्यान से सुनो, और बताए हुए नियमों का पालन
करो।’’
- जब मध्यान्तर हो चुका हो तो अपने भिक्षाटन (पिण्डपात) के लिए मत जाओ,
यथा समय भिक्षा माँग लो। असमय भिक्षाटन करने वालों के लिए जाल (फन्दे)
बिछे रहते हैं।
- ‘‘भिक्षाटन से पहले, तुम अपना चित्त, रूप, शब्द, गन्ध, स्वाद और स्पर्श की
आसक्ति से मुक्त कर लो।’’