424 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
चाहते हैं, क्योंकि वे कह सकते हैं कि एक व्यक्ति जो जुआरी है वह पत्नी
को रख पाने में समर्थ नहीं हो सकता है।’’
- ‘‘कुसंति में पड़ जाने के छह संकट है. (1) कोई जुआरी, (2) कोई व्यभिचारी,
(3) कोई शराबी, (4) कोई धूर्त, (5) कोई धोखेबाज, (6) कोई हिंसक,
उसका मित्र और साथी बन जाता है।’’
- ‘‘आलस्य की आदत के छह संकट हैंः (1) बहुत ठण्ड है कहकर काम नहीं
करता, (2) बहुत गर्मी है कहकर काम नहीं करता, (3) बहुत जल्दी है या
बहुत देर हो गयी है कहकर काम नहीं करता, (4) बहुत देर हो गई कहकर
काम नहीं करता, (5) मैं बहुत भूखा हूँ कहकर काम नहीं करता, और (6)
मेरा पेट बहुत भरा है कहकर काम नहीं करता और इन सबके होते हुए वह
बिना कुछ काम किये पड़ा रहता है। नई सम्पत्ति अर्जित नहीं कर पाता और
जो संपत्ति उसके पास होती है, वह नष्ट हो जाती है।’’
- ‘‘कोई भी धर्म तभी मनुष्य का सद्धर्म हो सकता है, जब वह उसे यह जानने
की शिक्षा दे कि कौन अच्छा-बुरा मित्र है।’’
- ‘‘वे चार हैं, जिन्हें मित्र के भेष में शत्रु समझना चाहिए, अर्थात् एक (1)
लोभी मनुष्य, (2) सिर्फ कहने वाला करने वाला नहीं, (3) चापलूस और
(4) फिजूल-खर्ची का साथी।’’
- ‘‘इनमें से प्रथम को इसलिए मित्र के भेष में शत्रु समझना चाहिए, क्योंकि वह
लोभी है, वह देता कम है माँगता अधिक है, वह अपने कार्य भय के कारण
करता है, वह स्वयं अपने स्वार्थ में लगा रहता है।’’
- ‘‘जो केवल कहता है और कर्म करता नहीं, उसे इसलिये मित्र के भेष में शत्रु
समझना चाहिए, क्योंकि वह भूत काल के सम्बन्ध में मैत्रीपूर्ण प्रदर्शन करता
है, वह भविष्य के सम्बन्ध से मैत्रीपूर्ण प्रदर्शन करता है, वह निरर्थक बातों
द्वारा तुम्हारा समर्थन पाने का प्रयास करता है, जब सेवा करने का अवसर आता
है, तो वह अपनी असमर्थता प्रकट कर देता है।’’
- ‘‘चापलूस को इसलिए मित्र के भेष में शत्रु समझना चाहिए, क्योंकि, वह बुराई
करने के लिये सहमति दर्शाता है, और भलाई करने के लिये असहमति, वह
तुम्हारे मुँह पर प्रशंसा करता है, तुम्हारी पीठ पीछे दूसरों से निन्दा करता है।’’ 21. ‘‘इसी प्रकार फिजूल खर्ची के साथी को भी मित्र के भेष में शत्रु समझना
चाहिए, क्योंकि जब तुम अनुचित समय में गलियों में घूमते हो, तुम्हारा साथी
होता है, जब तुम मेले में घूमते हो तुम्हारा साथी होता है, जब तुम जुऐ की
लत का शिकार होते हो तभी तुम्हारा साथी होता है।’’