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- ‘‘चार प्रकार के मित्र हैं, जिन्हें हृदय से यथार्थ मित्र समझना चाहिएः (1)
जो सहायक हो, (2) ऐसा मित्र जो सुख और दुख में समान रहे, (3) अच्छी
सलाह देने वाला मित्र, और (4) सहानुभूति रखने वाला मित्र।’’ 23. ‘‘उस मित्र को जो सहायक है इसलिये सच्चा मित्र समझना चाहिये, क्योंकि
जब तुम अरक्षित स्थिति में होते हो, तब तुम्हारी रक्षा करता है, जब तुम अरक्षित
स्थिति में होते हो तुम्हारी सम्पत्ति की रक्षा करता है। जब तुम्हारे पास करने के
लिये कार्य होते हैं, तब जितनी तुम्हें आवश्यकता हो उससे दुगुनी पूर्ति उपलब्ध
करा देता है। जब तुम भयभीत होते हो, तब तुम्हारा आश्रय होता है।’’ 24. ‘‘वह मित्र जो सुख और दुःख में समान रहता है, उसे इसलिए हृदय से सच्चा
मित्र समझना चाहिएः क्योंकि, वह तुम्हें अपने ‘रहस्य’ बता देता है, वह तुम्हारे
रहस्यों को गुप्त रखता है, तुम्हारी विपत्तियों में वह तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता
है, वह तुम्हारे लिए अपने जीवन का बलिदान तक कर देता है।’’ 25. ‘‘वह मित्र जो तुम्हारी आवश्यकतानुसार परामर्श देता है, उसे इसलिये हृदय से
सच्चा समझना चाहिये, क्योंकि वह तुम्हें बुराई करने से रोकता है, वह तुम्हें
जो सही है उसे करने का परामर्श देता है, वह तुम्हें ऐसी बातें सुनाता है, जिन
बातों को तुमने पहले नहीं सुना होगा, वह तुम्हारे लिए स्वर्ग का मार्ग खोलता
है।’’
- ‘‘वह मित्र जो सहानुभूति रखता है उसे इसलिये हृदय से सच्चा मित्र समझना
चाहिये, क्योंकि वह तुम्हारे अमंगल में आनन्दित नहीं होता है, वह तुम्हारी
खुशहाली पर आनन्दित होता है, वह उन सभी को रोकता है, जो तुम्हारी निन्दा
कर रहे होते हैं, वह उन सभी का समर्थन करता है जो तुम्हारी प्रशंसा कर रहे
होते हैं।’ तथागत ने इस प्रकार कहा।’’
- ‘‘उसे छह दिशाओं में प्रणाम करने की शिक्षा देने के बजाय जो धम्म मनुष्य
का सद्धर्म बताने योग्य हो उस धम्म की शिक्षा देनी चाहिए। वह उसे अपने
माता-पिता, अपने आचार्यों, अपनी पत्नी और बच्चों, अपने मित्रों और साथियों,
अपने नौकरों और कारीगरों तथा अपने धार्मिक गुरुओं का आदर और सम्मान
करने की शिक्षा देता है।’’
3. बच्चों के लिए विनय (जीवन-नियम)
- ‘‘एक बालक को अपने माता-पिता की सेवा यह सोचते हुए करनी चाहिये_
पहले उनके द्वारा पोषित होकर मैं अब उनका पोषण करूँगा, मैं उनके लिये
आवश्यक कर्त्तव्यों को पूरा करूँगा, मैं अपनी वंशावली और वंश-परम्परा को