426 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
कायम रखूँगा, मैं स्वयं को अपनी कुल-परम्परा के योग्य बनाऊँगा।’’ क्योंकि,
माता-पिता उसके प्रति अपने प्रेम को प्रकट करते हैं, वे उसे बुराई से बचाते
हैं, वे उसे सद्गुण के लिये प्रेरित करते हैं, उसे वे एक पेशे के लिये प्रशिक्षित
करते हैं, वे उसके लिये एक सुयोग्य विवाह-सम्बन्ध करते हैं, और वे उचित
समय पर उसे उसकी विरासत सौंप देते हैं।’’
4. शिष्य के लिए विनय (जीवन-नियम)
- ‘‘एक शिष्य को अपने आचार्यों के प्रति यथायोग्य व्यवहार करना चाहिये। उसे
अपने आसन से उठकर अभिवादन करना चाहिये। उसे पढ़ने-लिखने में उत्साह
दिखा कर, व्यक्तिगत सेवा द्वारा, और उनकी शिक्षा-ग्रहण करते समय विशेष
ध्यान द्वारा सेवा करनी चाहिये। आचार्य अपने शिष्यों से प्रेम करते हैं, वे उसे
उसमें प्रशिक्षित करते हैं, जिससे वे भली-भांति प्रशिक्षित होते हैं, जिसे उन्होंने
दृढ़तापूर्वक ग्रहण किया हुआ है, वे उसे दृढ़तापूर्वक ग्रहण करवाते हैं। वे उसे
हर कला की विद्या में पूरी तरह निपुण बनाते हैं, वे उसके मित्रों और साथियों
के मध्य उसकी प्रशंसा करते हैं। वे हर तरह से उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं।’’
5. पति और पत्नी के लिए विनय (जीवन-नियम)
- ‘‘एक पति और अपनी पत्नी के प्रति आदर-भाव प्रदर्शित कर सम्मान करके,
विश्वनीय बनकर, उसे अधिकार सौंप कर, उसे अलंकार की वस्तुयें उपलब्ध
कराकर सेवा करनी चाहिये। क्योंकि पत्नी उससे प्रेम करती है, उसके सभी
कार्य अच्छी तरह करती है, दोनों के रिश्तेदारों का आतिथ्य करके, विश्वसनीय
बन के, उसके द्वारा लाये गये सामान की हिफाजत करके, और अपने सभी
कार्यों को दक्षता व परिश्रम से पूर्ण करके पूरा करती है।’’
- ‘‘एक कुल-पुत्र को अपने मित्रों और साथियों के साथ उदारता, सौजन्यता और
परोपकारिता का व्यवहार करना चाहिये। उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना
चाहिये, जैसा वह स्वयं अपने साथ करता है, और अपने वचन का पक्का व
भला होना चाहिए, क्योंकि उसके मित्र और परिचित उसे प्रेम करते हैं, जब
वह असुरक्षित स्थिति में होता है, वे उसकी रक्षा करते हैं और ऐसे अवसरों
पर उसकी सम्पत्ति की रक्षा करते हैं, वे खतरे में एक आश्रय बन जाते हैं,
वे उसकी विपत्ति में उसका साथ नहीं छोड़ते और वे उसके परिवार के लिये
सम्मान दर्शाते हैं।’’