8. लड़कियों के लिए विनय (जीवन-नियम) - Page 456

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6. मालिक और नौकर के लिए विनय (जीवन-नियम)

  1. ‘‘एक मालिक को अपने नौकरों और कर्मचारियों के साथ उनकी क्षमता अनुसार

काम देकर, उन्हें भोजन तथा पारिश्रमिक देकर, रूग्णावस्था में उनकी तीमारदारी

करके, उनके साथ स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ बाँट कर खाकर और उन्हें समय-समय

पर छुट्टी देकर व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि नौकर और कर्मचारी अपने

मालिक से प्रेम करते हैं, वे उससे पहले उठते हैं, वे मालिक के सोने के बाद

सोते हैं, जो उन्हें दिया जाता है, वे उससे सन्तुष्ट रहते हैं, वे भली-भांति अपना

कार्य करते हैं, और वे सर्वत्र उसकी प्रशंसा और यश फैलाते हैं।’’ 2. ‘‘एक कुल-पुत्र को धार्मिक गुरुओं की सेवा कर्म, वचन, और मन से

स्नेहपूर्वक करके, उनके लिये सदैव अपने घर के द्वार खुले रखके उनकी

भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिये, क्योंकि धार्मिक गुरु उसे बुराई

से बचाते हैं, वे उसे भलाई के लिये प्रेरित करते हैं, वे उदार विचारों के साथ

प्रेम करते हैं, जो उसने नहीं सुना होता है, वे उसे उसकी शिक्षा देते हैं और

उसे सही और परिशुद्ध करते हैं, जो उसने सुना होता है।’’

7. उपसंहार

  1. तथागत के इस प्रकार कहने पर, ‘‘युवक गृहथ सिगाल यह बोला, ‘‘भगवान

अद्भुत है, सुन्दर, जैसे कोई उखड़े को जमा दे या उसे प्रकट कर दे, जो ढका

हुआ हो, या उसे रास्ता दिखा दे जो पथ-भ्रष्ट हो गया हो, या अंधेरे में रास्ता

दिखला दे। उसे इसी प्रकार तथागत द्वारा विभिन्न तरीकों से सत्य को सुस्पष्ट

कर दिया गया है।’’

  1. ‘‘और मैं भी बुद्ध, धम्म तथा संघ की शरण में जाता हूँ। कृपया तथागत मुझे

अपने उपासक के रूप में आज से जीवनपर्यन्त तक अपनी शरण में स्वीकार

करें।’’

8. लड़कियों के लिए विनय (जीवन-नियम)

  1. एक बार तथागत भद्दिय के समीप, जजीय वन में निवास कर रहे थे। वहाँ

मेण्डक का पौत्र वहां उग्गह उनसे मिलने आया और अभिवादन करके एक

ओर बैठ गया। इस प्रकार बैठे हुए उसने तथागत से कहाः

  1. ‘‘भगवान्, कृपया आप अन्य तीन भिक्षुओं के साथ कल मेरे यहाँ भोजन का

निमंत्रण स्वीकार करें।’’

  1. तथागत ने मौन रहकर स्वीकार किया।