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- अनाथपिण्डिक प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी स्वर्ण-मुद्राएँ बिछवाना प्रारम्भ
कर दिया, किन्तु जेत ने कहा, ‘‘अपने को कष्ट मत दो क्योंकि मैं इसे नहीं
बेचूँगा।’’ किन्तु अनाथपिण्डिक ने आग्रह किया, इस प्रकार उनमें मतभेद हुए
और विवाद हुआ। अन्ततोगत्वा वे न्यायालय की शरण में गये। 8. इस बीच लोगों ने इस असाधारण कार्यवाही की चर्चा करनी प्रारम्भ कर दी।
राजकुमार ने अधिक विवरण सुनने के पश्चात् और यह जानकारी प्राप्त कर कि
अनाथपिण्डिक न केवल अत्यधिक धनी था, बल्कि निष्कपट और सच्चा भी था,
उसके उद्देश्यों के विषय में पूछताछ की। तथागत का नाम सुनकर राजकुमार एक
पुण्य-कार्य में भागीदार बनने के लिये उत्सुक हो गया और उसने यह कहते हुए,
स्वर्ण मुद्राओं का आधा भाग ही स्वीकार किया ‘‘जमीन तुम्हारी है, किन्तु वृक्ष
मेरे हैं। मैं तथागत को दान के अपने हिस्से के रूप में वृक्षों को दान दूँगा।’’
- शिलान्यास कर चुकने के पश्चात्, उन्होंने तथागत के दिये निर्देशों के अनुसार
विहार को बनवाना प्रारम्भ कर दिया, जो उचित अनुपात में ऊँचाइयों तक ऊपर
उठ गया और यह यथोचित नक्काशियों द्वारा सुंरदरतापूर्वक अलंकृत था। 10. यह विहार जेतवन कहलाया और अनाथपिण्डिक ने तथागत को श्रावस्ती आने
और दान स्वीकार करने के लिये आमन्त्रित किया। तथागत कपिलवस्तु को छोड़
श्रावस्ती आ गये।
- जब तथागत ने जेतवन में प्रवेश किया, अनाथपिण्डिक ने पुष्प-वर्षा की और
सुगन्धित धूप जलाई और दान देने की प्रक्रिया के रूप में उसने यह कहते हुए
स्वर्ण सुराही से जल उड़ेला, ‘‘यह जेतवन विहार मैं संसार भर के भिक्षु-संघ
के प्रयोग के लिये समर्पित करता हूँ।’’
- तथागत ने दान स्वीकार किया और उत्तर दिया, ‘‘सभी अमंगल प्रभावों का नाश
हो_ यह दान सदाचरण के राज्य का विस्तार करे और मनुष्यमात्र और विशेषकर
दाताओं के स्थायी कल्याण की वृद्धि करे।’’
- अनाथपिण्डिक उन अस्सी प्रमुख शिष्यों में से एक थे, जो प्रमुख दानदाता की
पद्वी से अलंकृत थे।
3. जीवक का दान
- जब कभी तथागत राजगृह में होते थे, जीवक नामक वैद्य दिन में दो बार तथागत
के दर्शनार्थ जाया करता था।
- जीवक को लगा कि राजा बिम्बिसार ने तथागत को जिस वेलुवन को दान किया
हुआ, वह अत्यधिक दूर है।