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तैयार कर वे प्रत्येक उनमें से एक-एक में सवार होकर अपने कारवाँ सहित
चल पड़े।
- वे और आम्रपलि मार्ग में एक दूसरे के आमने-सामने आ गये।
- और आम्रपालि युवक लिच्छवियों रथों के पहियों से पहिया टकराती हुई पास से
गुजरी और लिच्छवियों ने गणिका आम्रपालि से पूछा, ‘‘क्या बात हैं, आम्रपालि!
कि तुम इस प्रकार हमसे रथ टकराती हुई जा रही हो?’’
- ‘‘मेरे स्वामियों! मैंने अभी तथागत को और उनके भिक्षुओं को कल के भोजन
के लिये आमंत्रित किया है,’’ आम्रपालि ने कहा।
- ‘‘आम्रपालि! यह सम्मान एक लाख के बदले हमें बेच दो,’’ उन्होंने कहा।
- ‘‘मेरे स्वामियों! यदि आप इसके उपनगरों सहित सम्पूर्ण वैशाली भी मुझे प्रस्तुत
करें, तो भी मैं यह अवसर नहीं छोडूँगी।’’
- लिच्छवी यह चिल्लाते हुए अपने हाथ मलने लगे, ‘‘हम इस आम्रपालि द्व
ारा परास्त हो गये हैं। हम इसे आम्रपालि द्वारा पराजित हो गये हैं,’’ और वे
आम्रपालि के आम्रवन की ओर बढ़ गये।
- यह जानते हुए कि वे परास्त हो गये थे उन्होंने फिर भी इस आशा से तथागत
के पास जाने की सोची कि संभवतः तथागत पुनर्विचार करें और उनके निमन्त्रण
को प्राथमिकता दें। अतः वे आम्रपालि के आम्रवन की ओर बढ़ गये। 15. जब तथागत ने दूर से लिच्छवियों को आते हुए देखा, उन्होंने भिक्षुओं को
सम्बोधित किया और कहा, ‘‘भिक्षुओ! जिन भिक्षुओं ने कभी देवताओं को
नहीं देखा है, वह इन लिच्छवियों की मण्डली को ध्यान से देखें, लिच्छवियों
की इस मण्डली का अवलोकन करें, लिच्छवियों की इस मण्डली से अनुमान
लगायें, क्योंकि वे परलोक के देवताओं के समान हैं।’’
- और जब वे रथों पर चढ़ कर वहाँ तक पहुँच गये, जहाँ तक रथों के लिये
जमीन उपयुक्त थी, लिच्छवी वहाँ उतर गये और तब पैदल उस स्थान तक
गये जहाँ तथागत विराजमान थे और आदरपूर्वक अभिवादन कर उनकी बगल
में अपने आसन ग्रहण किये।
- तब उन्होंने तथागत को सम्बोधित किया और कहा, ‘‘तथागत! भिक्षु-संघ के
साथ कल हमारे घर में भोजन कर हमें सम्मानित करें?’’
- उनका उत्तर था, ‘‘लिच्छवियों! मैंने कल आम्रपालि के यहाँ भोजन करने का
वचन दे दिया है।’’