5. विशाखा की दान-शीलता - Page 465

436 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. तब लिच्छवी जान गये कि वे असफल हो गये हैं। और अपना धन्यवाद ज्ञापित

करने और तथागत के वचनों का अनुमोदन करने के उपरान्त वे अपने आसनों

से उठे और तथागत को प्रणाम किया तथा उनकी प्रदक्षिणा करके वहाँ से विदा

हुए।

  1. रात की समाप्ति पर गणिका आम्रपालि ने अपने प्रसाद के भिन्न-भिन्न प्रकार के

स्वादिष्ट भोजन तैयार कराए और यह कहते हुए तथागत को सूचना भिजवायी

कि ‘‘भगवान्, समय हो गया है और भोजन तैयार है।’’

  1. तब तथागत ने प्रातः काल चीवर धारण किया, अपना पात्र और चीवर लिया और

भिक्षुओं के साथ उस स्थान पर गये जहाँ आम्रपालि का प्रासाद था और जब वे

वहाँ आ गये तब उस आसन पर विराजमान हो गये, जो उनके लिये सुसज्जित

था। और गणिका आम्रपालि ने बुद्ध प्रमुख भिक्षु-संघ को स्वादिष्ट भोजन परोसे

और अन्त तक आग्रहपूर्वक परोसती रही, जब तक उन्होंने अस्वीकार नहीं कर

दिया।

  1. जब तथागत ने अपना भोजन समाप्त कर लिया और अपना पात्र तथा अपने

हाथ धो लिये, गणिका ने एक नीचा आसन मँगाया और उनके बगल में बैठ

गयी तथा तथागत को सम्बोधित कर कहाः

  1. ‘‘भगवान!, मैं अपना उद्यान आपके एवं भिक्षु-संघ को दान करती हूँ।’’ तथागत

ने दान स्वीकार कर लिया और एक धार्मिक प्रवचन देने के उपरान्त वे अपने

आसन से उठे और वहाँ से चले गये।

5. विशाखा की दान-शीलता

  1. विशाखा श्रावस्ती की एक धनी महिला थी। उसके अनेक बच्चे और नाती-पोते

थे।

  1. जब तथागत श्रावस्ती में ठहरे हुए थे, विशाखा उस स्थान पर गयी, जहाँ तथागत

थे और उन्हें अपने घर पर भोजन ग्रहण करने का निमन्त्रण दिया, जिसे तथागत

ने स्वीकर कर लिया।

  1. उस रात में तथा अगली सुगह मूसलाधार वर्षा हुई और भिक्षुओं ने अपने चीवरों

को सूखा रखने के लिये उतार दिए और वर्षा अपने नंगे शरीरों पर पड़ने दी। 4. अगले दिन तथागत ने जब अपना भोजन समाप्त कर लिया, विशाखा ने अपना

आसन उनके बगल में ग्रहण किया और इस प्रकार बोली, भगवान्! मैं आप से

आठ वरदान माँगती हूँ।’’