5. विशाखा की दान-शीलता - Page 466

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  1. तब तथागत ने कहा, ‘‘हे विशाखा! तब तक कोई वरदान नहीं देते जब तक

वे यह न जाने लें कि वे क्या हैं?’’

  1. विशाखा ने उत्तर दिया, ‘‘भगवन्! जो मैं वरदान मांगने जा रही हूँ वे उचित

और आपत्ति-रहित हैं।’’

  1. वरदान माँगने की अनुमति मिलने पर, विशाखा ने कहा, ‘‘मैं चाहती हूँ, भगवान्,

अपने पूरे जीवन-काल के दौरान संघ को वर्षा-काल में चीवर, आगन्तुक भिक्षुओं

को भोजन, निर्गामी भिक्षुओं को भोजन तथा रोगी भिक्षुओं को भोजन, उनके

लिये भोजन, जो रोगियों की सेवा करते हैं, रोगी के लिये दवा, संघ के लिये

चावल-दूध की निरन्तर आपूर्ति तथा भिक्षुणियों के लिये नहाने का चीवर दान

कर सकूँ।’’

  1. तथागत ने कहा, ‘‘किन्तु, हे विशाखा! तथागत से इन आठ वरदानों को माँगने

के पीछे तुम्हारा प्रयोजन क्या है?’’

  1. तब विशाखा ने उत्तर दिया, ‘‘भगवान्! मैंने अपनी नौकरानी को आदेश दिया

और कहा, ‘‘तुम जाओ और भिक्षु-संघ को सूचित करो कि भोजन तैयार है, तब

मेरी नौकरानी गयी_ किन्तु जब वह विहार में पहुँची, उसने देखा कि भिक्षुओं

ने अपने चीवर उतार रखे थे, उस समय वर्षा हो रही थी, तो उसने सोचाः

‘‘भिक्खु नहीं हैं, बल्कि नग्न तपस्वी हैं जो अपने ऊपर वर्षा होने दे रहे हैं।

अतः वह मेरे पास लौट आयी, तदनुसार सूचित किया तब मुझे उसको दूसरी

बार भेजना पड़ा था।’’

  1. ‘‘भगवान् नग्नता! अशुचिपूर्ण और घृणित है। भगवान्! यही वह परिस्थिति थी

जिससे अपने पूरे जीवन-काल के दौरान संघ को वर्षाकाल के प्रयोग के लिये

विशेष चीवर उपलब्ध कराने की इच्छा मेरे ध्यान में आई है।’’

  1. ‘‘जहाँ तक मेरी दूसरी इच्छा का सम्बन्ध है, भगवान्! एक आगन्तुक भिक्षु,

पीछे मार्गों से अपरिचित होने के कारण टेड़े-मेड़े मार्गों से आगे के कारण, और

उन स्थलों को न जानते हुए जहाँ से भोजन प्राप्त किया जा सकता है, भिक्षा

के लिये प्रयास करते हुए अपने मार्ग से थका-माँदा आता है। भगवान्! यही

वह कारण था जिससे मैं अपने पूरे जीवन-काल के दौरान संघ के आगन्तुक

भिक्षुओं के लिये भोजन उपलब्ध कराने की इच्छा मेरे ध्यान में आई है।’’

  1. ‘‘तीसरे, भगवान्! निर्गामी भिक्षु, जब भिक्षाटन की तलाश कर रहा हो, पीछे छूट

सकता है, या उस स्थान पर अत्यन्त देर से पहुँचता है, जहाँ वह जाना चाहता

हो, वह मार्ग में थक-माँदा ही रवाना हो जाता है।’’