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- उन्हें भिक्षा के लिये वहाँ खड़े देखकर, ब्राह्मण ने कहा, ‘‘श्रमण! खाना खाने
से पूर्व, मैं (हल) जोतता हूँ और (बीज) बोता हूँ, और तुम्हें भी खाना खाने
से पहले (हल) जोतना और (बीज) बोना चाहिये।’’
‘‘ब्राह्मण! मैं खाने से पहले जोतता और बोता हूँ।’’
‘‘किसी भी तरह, श्रमण गौतम के जुए या हल, या हल की फाल, या बैलों
को हाँकने की पैनीया, बैलों की जोड़े मेरे देखने में नहीं आते, तो आप कहते
हैं कि आप खाना खाने से पहले जोतते, बोते हैं।’’
- ‘‘आप एक कृषक होने का दावा करते हैं, किन्तु हम आपके कृषि के किसी
भी साधन को नहीं देखते। हमें बतायें आप कैसे खेती करते हैं, आपकी कृषि
के विषय में हम और अधिक सुनना चाहेंगे।’’
- भगवान् ने उत्तर दिया, ‘‘श्रद्धा मेरा बीज है, जीवन की तपस्यायें मेरी वर्षा हैं,
प्रज्ञा मेरे जुए और हल हैं, पाप-भीरुता मेरा दण्ड है_ विचार जुए की रस्सी है
और स्मृति (चित्त की जागरूकता) हल की फाल तथा पैनी है।’’
- ‘‘वचन और कर्म से संयत और भोजन में संयमी होकर, मैं अपनी फसल को
खर-पतवार से मुक्त रखता हूँ, और तब तक विश्राम नहीं करता, जब तक सुख
की फसल नहीं कट जाती। अप्रमाद मेरा मजबूत बैल है, जो बाधाएँ देखकर भी
पीछे नहीं मुड़ता है। वह मुझे सीधा शान्ति के अन्तिम लक्ष्य तक ले जाता है,
जहाँ दुःख का अन्त हो जाता है। इस प्रकार मैं अमृतत्व के फसल की खेती
करता हूँ और जो कोई मेरी तरह खेती करता है उसके दुखों का अन्त हो जाता
है।’’
- तत्पश्चात् ब्राह्मण ने एक बड़ी काँसे की थाली में खीर परोसी और यह कहते
हुए भगवान् को अर्पित की, ‘‘गौतम! यह खाएँ, निस्सन्देह आप भी एक कृषक
ही हैं, आप अमृत के फसल की खेती करते हैं।’’
- किन्तु तथागत ने कहा ‘‘मैं उपदेश का कोई शुल्क नहीं लेता। प्रज्ञावान् लोग
इसका समर्थन नहीं करते, सम्बुद्ध ऐसे शुल्क को तिरस्कारपूर्वक अस्वीकार
करते हैं, जब तक यह धम्म-विनय विद्यमान है, तब तक यही प्रचलन बना
रहना चाहिये। दूसरे श्रमण ब्राह्मण हैं, जो संयत हैं, शान्त हैं, जिनका सम्यक्
आचरण है, जो निर्दोष हैं-ऐसे जो पुण्य क्षेत्र हैं, तुम उन्हीं को यह दो।’’
- इन वचनों को सुनकर ब्राह्मण भगवान् के पास गया और तथागत के चरणों में
अपना शीश झुकाकर, रोने लगा, ‘‘अद्भुत है, गौतम! सर्वथा अद्भुत है। जैसे
एक मनुष्य नीचे गिरे हुए को पुनः सीधा कर दे, या जो छिपा हुआ है उसे