6. देवदत्त फुफेरा भाई तथा शत्रु - Page 477

448 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि आप एक सुन्दर लड़की को अंगीकार करना तो

भली-भाँति जानते हैं, किन्तु आप उस अंगीकार के परिणामस्वरूप जन्म लेने

वाले नवजात शिशु का ध्यान रखना नहीं जानते।’’ सभा में उपस्थित लेगा मौन

ही बैठ रहे।।

  1. भगवान् बुद्ध ने, अपने उपदेश को बीच में रोककर, उसे बड़ी गम्भीरता से उत्तर

दिया, ‘‘बहन! जो कुछ तुमने कहा, वह सत्य है या असत्य, इसका ज्ञान केवल

मुझे और तुझे ही है।’’

  1. चिंचा जोर-जोर से खाँसते हुए, बोली, ‘‘हा-हा, हे आचार्य! ऐसी बातों का ज्ञान

केवल हम दोनों को ही हो सकता है।’’

  1. उसके खाँसने से वह गाँठ ढीली पड़ गयी, जिससे उसने लकड़ी के टुकड़े को

अपने पेट पर बाँध रखा था, और वह लकड़ी उसकी पराजय के रूप में उसके

पैरों पर गिर पड़ी। चिंचा कहीं की न रही।

  1. और लोगों ने उसे पत्थरों और डंडों से मार-मार कर भगा दिया गया।

6. देवदत्त फुफेरा भाई तथा एक शत्रु

  1. देवदत्त भगवान् बुद्ध का फुफेरा भाई था। किन्तु प्रारम्भ से ही वह उनसे ईर्ष्यालु

था और उन्हें अत्यधिक नापसन्द करता था।

  1. जब राजकुमार सिद्धार्थ अपना गृहत्याग कर चले गये, तो देवदत्त ने यशोधरा से

प्रेम बढ़ाने का प्रयास किया।

  1. एक बार यशोधरा सोने ही वाली थी, तब वह किसी के द्वारा भी न रोका जाकर

एक भिक्षु के छद्म रूप में उनके कक्ष में प्रवेश कर गया। यशोधरा ने उससे

पूछा, ‘‘भिक्षु! आप क्या चाहते हैं? क्या आपके पास मेरे पति का दिया हुआ

कोई सन्देश है?’’

  1. देवदत्त ने कहा, ‘‘तुम्हारा पति, उसे तुम्हारी क्या खाक चिंता है। तुम्हारे सुखी

संसार में से वह तुम्हें निर्दयतापूर्वक और धूर्तता से छोड़ कर चला गया।’’ 5. यशोधरा ने उत्तर दिया, ‘‘किन्तु ऐसा उन्होंने बहुतों के हित के लिये किया है।’’ 6. देवदत्त ने सलाह दी, ‘‘वह जो कुछ भी हो, अब तुम उसकी अवज्ञापूर्ण क्रूरता

का बदला लो।’’

  1. यशोधरा ने विरोध किया, ‘‘जबान बन्द करो, हे भिक्षु! तुम्हारे शब्द और विचार

अपवित्र और दुर्गन्ध से भरे हैं।’’