6. देवदत्त फुफेरा भाई तथा शत्रु - Page 478

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  1. ‘‘क्या तुमने नहीं पहचाना, यशोधरा! मैं देवदत्त हूँ, जो तुमसे प्रेम करता है।’’
  2. ‘‘देवदत्त! मैं तुम्हें झूठा और दुष्ट ही समझती थी। मैं ने कभी नहीं सोचा था

कि तुम जैसा बुरा आदमी बुरा भिक्षु बन सकता है, किन्तु यह नहीं समझती

थी कि तुम इतने कमीने हो सकते हो।’’

  1. ‘‘यशोधरा! यशोधरा! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ’’ देवदत्त ने कहा। ‘‘और तुम्हारा

पति तुम्हारे प्रति केवल घृणा दर्शाता है। वह तुम्हारे प्रति क्रूर रहा है। मुझे प्रेम

करो और उसकी क्रूरता का बदला लो।’’

  1. यशोधरा के पीले और क्षीण मुख पर एक रक्तरंजित वर्ण का पुट चढ़ गया।

आँसू उसके गालों पर से ढलकने लगे।

  1. ‘‘देवदत्त! तुम मेरे प्रति क्रूर हो। यदि तुम्हारे प्रेम में कुछ सच्चाई होती, तो यह

मेरा अपमान ही होता। जब तुम कहते हो कि तुम मुझसे प्रेम करते हो, तो तुम

केवल झूठ बोल रहे हो।’’

  1. ‘‘जब मैं युवा और सुन्दर थी, तुमने मुश्किल से ही मेरी ओर देखा होगा। अब

मैं जीर्ण हूं, दुःख और वेदना से टूट गयी हूँ, तुम रात में आये हो अपना कपटी

और दोषी प्रेम प्रकट करने। तुम एक नीच और कायर हो।’’ 14. और वह चिल्लाई, ‘‘देवदत्त! यहाँ से बाहर, चले जाओ,’’ और देवदत्त वहाँ से

चला गया।

  1. देवदत्त भगवान् बुद्ध से अत्यंत शत्रुता रखता था, क्योंकि उसे संघ का प्रधान

नहीं बनाया गया था, जबकि सारिपुत्त और मोगल्लापन को संघ का प्रधान बना

दिया था। देवदत्त ने तीन बार भगवान् बुद्ध का जीवन समाप्त करने का प्रयास

किया, किन्तु उनमें से किसी एक में भी सफल नहीं हुआ। 16. एक समय तथागत गृध्रकूट पर्वत नामक पहाड़ी की छाया में ऊपर-नीचे

चहलकदमी कर रहे थे।

  1. देवदत्त उस पहाड़ी के ऊपर चढ़ गया और तथागत के प्राण-हरण की नीयत

से एक विशाल चट्टान को नीचे लुढ़का दिया, किन्तु वह एक अन्य चट्टान

पर गिरी और वहीं गड़ गयी, केवल उस पत्थर के गिरते हुए उसमें से टूटकर

छोटे से टुकड़े ने तथागत के पाँव को लहूलुहान कर दिया।

  1. दूसरी बार बुद्ध का जीवन समाप्त करने का एक और प्रयास किया।
  2. इस बार देवदत्त राजकुमार अजातशत्रु के पास गया और कहा, ‘‘मुझे कुछ

आदमी दो।’’ और राजकुमार अजातशत्रु ने अपने आदमियों को आदेश दिया,

‘‘जो कुछ भी योग्य देवदत्त तुम्हें कहते हैं, वह करो।’’