7. ब्राह्मण और भगवान् बुद्ध - Page 480

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  1. वे ब्राह्मण गृहस्थ अश्रदालु थे, मिथ्या-दृष्टियाँ रखते थे तथा स्वभाव से कृपण

थे।

  1. उन्होंने कहा, ‘‘यदि श्रमण गौतम इस गाँव में प्रवेश कर गये और दो या तीन

दिन ठहर गये, तो इन सभी लोगों को धर्मान्तरित कर देंगे। तब ब्राह्मण-धर्म के

पास कोई सहारा नहीं रहेगा। इसलिये, हमें अपने गाँव में उसका प्रवेश अवश्य

ही रोकना चाहिये।’’

  1. गाँव तक पहुँचने के लिये एक नदी पार करनी पड़ती थी। तथागत का गाँव

में प्रवेश रोकने के लिये ब्राह्मणों ने नावों को घाटों से दूर हटा दिया और पुलों

आदि को अनुपयोगी बना दिया।

  1. उन्होंने एक कुंए के अतिरिक्त सभी कुओं को घास-फूस से भर दिया और

प्याऊओं, विश्रामालयों तथा छप्परों को छुपा दिया।

  1. तथागत ने उनकी करतूतों को जानकर और उनके प्रति करुणापूर्वक रहते हुए,

अपने भिक्षु-संघ के साथ नदी पार की और कुछ ही समय में थून-ब्राह्मण गाँव

में पहुंच गये।

  1. उन्होंने सड़क छोड़ दी और एक पेड़ के नीचे बैठ गये। उस समय बहुत-सी

स्त्रियाँ पानी लिये हुए तालाब के समीप से गुजर रही थीं।

  1. उस गाँव में एक सहमति हो चुकी थी, ‘‘यदि श्रमण गौतम वहाँ आते हैं, उनका

कुछ भी स्वागत-सत्कार इत्यादि नहीं होना चाहिये और जब वे एक-एक घर

तक आयें, न तो उन्हें और न ही उनके अनुयायियों को कोई भोजन या जल

दिया जाना चाहिये।’’

  1. तब एक ब्राह्मण की दासी पानी का घड़ा साथ ले जा रही थी, उसने तथागत

और भिक्षुओं को देखा और समझा कि वे थके-माँदे और प्यासे हैं, श्रद्धालु

हृदय की होने के कारण वह उन्हें जल देना चाहती थी।

  1. उसने अपने मन में सोचा, यद्यपि इस गाँव के लोगों ने यह निश्चय किया है कि

श्रमण गौतम को कुछ भी नहीं दिया जायेगा और यहाँ तक कि किसी भी प्रकार

का सम्मान नहीं दर्शाया जायेगा, ‘‘इस समय यदि मैं इन सर्वोच्च ‘पुण्य-क्षेत्रों’

को, अपने पुण्यवान दान के योग्य पाने वालों को थोड़ा जल देकर मैं अपनी

मुक्ति की नींव न रखूँ, तो इसके बाद कब मैं इन दुःखों से मुक्ति पाऊँगी?’’

  1. ‘‘मेरे स्वामियो! भले ही गाँव में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति मुझे पीटे या बाँध

डाले, तब भी मैं इस समय ‘पुण्य-क्षेत्र’ को पानी का दान दूँगी।’’