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मंत्रों का अक्षरशः ज्ञान है, जैसे- अट्ठक, वामक, वामदेव वस्समित्त, यमदग्नि,
अंगिरस, विश्वमित्र, भारद्वाज ने पाँच तरह के ब्राह्मण बताए है, (1) ब्रह्म-सदृश
ब्राह्मण, (2) देव-सदृश ब्राह्मण, (3) बन्धन-युक्त ब्राह्मण, (4) बंधन ब्राह्मण
भंजक, और (5) अन्त्यज ब्राह्मण। दोन इसमें से तुम कौन हो?’’
- ‘‘इन पाँच ब्राह्मणों के विषय में हम नहीं जानते हैं, श्रमण गौतम! तथापि हम
जानते हैं कि हम ब्राह्मण हैं। यह मेरे लिये अच्छा होता, यदि श्रमण गौतम मुझे
धम्म की शिक्षा दें, जिससे कि मैं उन पाँचों के विषय में जान सकूँ।’’
‘‘तब सुनो, ब्राह्मण! ध्यान दो जो मैं कहता हूँ।’’
‘‘हाँ तथागत,’ उसने उत्तर दिया_ और तथागत ने कहाः
‘‘दोन! एक ब्राह्मण ब्रह्म-सदृश कैसे होता है?’’
‘‘दोन! एक ब्राह्मण का उदाहरण लो, जो माता-पिता दोनों की ओर से सुजात है
पूर्व सात पीढि़यों तक पवित्र है, जन्म की दृष्टि से निर्विवाद और निर्दोष है-वह
अड़तालीस वर्षों तक ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करता है, वह अधम्मानुसार
नहीं-बल्कि धम्मानुसार आचार्य को दक्षिणा चुकाने के लिए स्वयं को रत रहता
है!’’
- ‘‘और धम्म क्या है? दोन! वह कभी भी न तो कृषक, न व्यापारी, न ग्वाला,
न धुनर्धारी, न राजकर्मचारी के रूप में और न ही किसी अन्य पेशे द्वारा अपनी
जीविका कमाता है, बल्कि केवल भिक्षाटन के द्वारा, भिक्षुक के पात्र का अनादर
न करते हुए जीवन व्यतीत करता है।’’
- ‘‘और वह आचार्य को शिक्षण के लिये दक्षिणा चुकाता है, अपने बाल-दाढ़ी
मुंडवाता है, काषाय-वस्त्र धारण करता है और गृह-त्याग कर अनागारिक की
अवस्था में रहता है।’’
- ‘‘और इस प्रकार प्रव्रजित हो, वह मैत्री भावना से युक्त हो विश्व की एक
दिशा, दूसरी दिशा, तीसरी दिशा और चौथी दिशा में विहार करता है, तत्पश्चात्
ऊपर, नीचे, आड़े प्रत्येक जगह सम्पूर्ण विस्तृत संसार में वह मैत्री से युक्त हो
विहार करता है जो दूरगामी, प्रशस्त, असीम तथा घृणा, द्वेष से रहित होता है।
’’
- ‘‘वह करुणा से युक्त हो, मुदिता से युक्त हो, उपेक्षा से युक्त हो, वह विश्व
की एक दिशा, दूसरी दिशा, तीसरी दिशा, और चौथी दिशा में विहार करता है_
तत्पश्चात् ऊपर, नीचे, आड़े प्रत्येक जगह, सम्पूर्ण विस्तृत संसार में वह करुणा,
मुद्रिता तथा घृणा व द्वेष से रहित होता है।’’