3. अहिंसा-सिद्धान्त की आलोचना - Page 489

460 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. तथागत ने ‘अहिंसा’ के अपने सिद्धान्त द्वारा जो सिखाया है यह उन लोगों की

पूर्णतया गलत व्याख्या थी।

  1. तथागत ने विभिन्न अवसरों पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है जिससे कि इसमें

किसी को किसी तरह से अस्पष्टता या गलतफहमी के लिये कोई स्थान न रह

जाये।

  1. एक ऐसा अवसर था, जिसका उल्लेख किया जाना चाहिये, जब उन्होंने एक

सैनिक के भिक्षु-संघ में प्रवेश के सम्बन्ध में एक नियम बनाया था।

  1. एक समय मगध राज्य के सीमान्त-प्रदेश में उत्पादत मच रहे थे। तब मगध-नरेश

सेनिय बिम्बिसार ने सेना के सेनापति को आदेश दिया, ‘‘अब जाओ और अपने

सेनानायकों को कहो कि वे सीमान्त प्रदेशों में अपराधियों की तलाश करें, उन्हें

दण्डित करें और शान्ति स्थापित करें।’’ सेनापति ने तद्नुसार कार्य किया।

  1. सेनापति का आदेश सुनकर सेनानायक स्वयं दुविधा में पड़ गए। वे जानते थे

कि तथागत ने शिक्षा दी है कि जो युद्ध में जाते हैं और युद्ध में आनन्द पाते

हैं, पाप करते हैं तथा बहुत अपुण्य लाभ करते हैं। दूसरी ओर, अपराधियों को

पकड़ने और उनका वध करने की राजा की यह आज्ञा है। अब हम क्या करें?

सेनानायकों ने स्वयं अपने से पूछा।

  1. तब इन सेनानायकों ने सोचा-‘‘यदि हम बुद्ध के भिक्षु-संघ में प्रवेश कर लें

तो हम इस दुविधा से बच निकलने में सक्षम होंगे।’’

  1. इस प्रकार ये सेनानायक भिक्षुओं के पास गये और उनसे प्रव्रज्या का निवेदन

किया। भिक्षुओं ने उन्हें प्रव्रजित तथा उपसम्पदित कर दिया और सेनानायक सेना

से लुप्त हो गये।

  1. सेना के सेनापति को जब सेना के सेनानायक दिखाई नहीं पड़े, तब सिपाहियों

से पूछा, ‘‘क्या बात है कि सेनानायक कहीं क्यों नहीं दिखाई पड़ रहे हैं?’’

‘‘सेनापति! सेनानायकों ने भिक्षुओं के धार्मिक जीवन को अपना लिया है।’’

सिपाहियों ने उत्तर दिया।

  1. तब सेना का सेनापति अप्रसन्न और बहुत क्रोधित हो गया, ‘‘भिक्षु राजकीय

सेना के लोगों को कैसे प्रव्रजित कर सकते हैं।’’

  1. जो कुछ घटित हुआ उसे सेनापति ने राजा को सूचित किया और राजा ने न्याय

अधिकारियों से पूछा, ‘‘यह बताया जाए कि जो राजकीय सेना को प्रव्रजित करे,

उसको क्या दण्ड मिलना चाहिये?’’

  1. ‘‘हे महाराज! उपाध्याय का सिर काट डाला जाना चाहिये, जो कम्मावाचा का