20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- जब वह वहां से चलने को हुआ, तो कुछ ने उसे पुष्प-हारों द्वारा बाँधने की
कोशिश की और कुछ ने मधुर, किन्तु महावत के अंकुश के चुभने के समान
शब्दों से प्रहार किया।
- किसी ने उससे बात करने के लिए आम की शाखा को हाथ में पकड़ उससे
फूल लेकर वासना में लिप्त कहा-‘‘यह किसका फूल है?’’
- किसी ने आदमी की तरह चाल-ढाल बनाकर उससे कहा-‘‘तुम स्त्री द्वारा जीते
जा चुके हो, जाओ अब इस पृथ्वी को जीतो।’’
- फिर एक दूसरी आँखें मटकाती हुई, नील-कमल को सूँघती हुई अस्पष्ट स्वर
में राजकुमार को सम्बोधित करने लगी।
- ‘‘मेरे स्वामी! मधु की तरह सुगंध वाले फूलों से आच्छादित इस आम्रकुंज को
देखें, जहाँ कोकिल ऐसे गाती है, जैसे किसी स्वर्ण-पिंजर में कैद हो।’’
- ‘‘स्वामी! यहां आएं, इस अशोक वृक्ष को देखें, जो प्रेमियों के विरह को बढ़ाता
है, जहाँ मधुकर गूँजते हैं, जैसे वे आग द्वारा झुलसा दिए गए हों।’’
- ‘‘आइए! इस तिलक वृक्ष को देखें, जिस पर आम्र-शाखाएँ लिपटी हुई हैं। जैसे
स्वेत वस्त्र में कोई पीत वस्त्र वाली स्त्री किसी श्वेत वस्त्रधारी पुरुष से लिपटी
हो।’’
- ‘‘ताजा अंगूरी-रस की तरह चमकीले पुष्पित कुरबक वृक्ष को देखें, जो इस
प्रकार झुका हुआ है, जैसे यह स्त्रियों के नाखूनों की लाली द्वारा हुआ हो।’’
- ‘‘आइए, नवपल्लव से आच्छादित इस अशोक वृक्ष को देखें, वह ऐसे खड़ा है
मानो हमारे हाथों की सुन्दरता पर लज्जित हो।’’
- ‘‘इस झील को ही देखें जिसके तट पर सिंदवार उगी हुई है, मानो एक सुन्दर
स्त्री श्वेत वस्त्र में लेटी हुई हो।’’
- ‘‘महिलाओं की राजसी सामर्थ्य शक्ति को देखें, पानी में वह चकवी आगे-आगे
जाती है और उसका पति दास की भाँति उसका पीछा करता है।’’
- ‘‘आओ! और मतवाली कोयल के गीत सुनें। दूसरे कोयल बेफिक्र ऐसे गाती हैं
जैसे दूसरी उसका अनुकरण कर रहे हों।’’
- ‘‘अच्छा होता यदि सर्वदा अपनी बुद्धिमत्ता का मनन करने वाले चिन्तनशील
व्यक्ति के विचार की जगह वसन्त ऋतु में उत्पन्न पक्षियों का उन्माद भी आप
में होता।’’