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- इस प्रकार इन सभी प्रेमासक्त नवयुवतियों ने राजकुमार को अनेक प्रकार की
चालों से अपने वश में करने का प्रयास किया।
- इतने प्रयासों के बाद भी वह संयतेन्द्रिय न तो प्रसन्न हुआ और न ही
मुस्कराया।
- उनकी वास्तविक अवस्था देखकर राजकुमार दृढ़ एवं शांत चित्त से मनन करता
रहा।
- ‘‘इन स्त्रियों में ऐसी क्या कमी है, जो ये अनुभव नहीं कर पातीं कि यौवन
अस्थिर है। बुढ़ापा उनकी समस्त सुन्दरता को क्षय कर देगा।’’
- इन चिकनी-चुपड़ी बातों का दौर महीनों, वर्षों चलता रहा, लेकिन कुछ भी
परिणाम नहीं निकला।
11. राजकुमार को प्रधानमंत्री के द्वारा समझना
- उदायी समझ गया कि युवतियाँ असफल हो गई हैं और राजकुमार ने उनमें कोई
रुचि नहीं दिखायी।
नीति में कुशल उदायी ने राजकुमार से स्वयं बात करने का विचार किया।
एकांत में उदायीन ने में राजकुमार से कहा-‘‘आपको योग्य मित्र की तरह राजा
ने मेरी नियुक्ति की है, इसलिए मैं आपसे प्रिय मित्र के रूप से बातें करना
चाहता हूँ।’’ इस प्रकार उदायी ने कहना आरम्भ कियाः
- ‘‘अहितकर काम से बचाना, हितकर काम में लगाना और विपत्ति में साथ न
छोड़ना-मित्र के यही तीन लक्षण हैं।’’
- ‘‘मित्रता का वचन देकर भी अगर मैं आपको पुरुषार्थ से विमुख होने पर
सावधान नहीं कर सका, तो मैं अपने मैत्री-धर्म से च्युत होता हूँ।’’
- ‘‘ऊपरी मन से भी स्त्रियों से संबंध रखना अच्छा होता है। यह संकोच खत्म
करने तथा अपना मनोरंजन करने दोनों में ही लाभदायक है।’’
- ‘‘स्त्री के प्रति आदरपूर्वक व्यवहार करने और उसकी इच्छानुसार कार्य करने से
स्त्री का मन जीता जा सकता है। निस्संदेह, सद्गुण भी प्रेम के ही कारण होते
हैं और स्त्रियाँ आदर चाहती हैं।’’’
- ‘‘हे विशाल - नयन वाले राजकुमार! दिल से न चाहते हुए भी उनकी सुन्दरता
के अनुरूप उन्हें प्रसन्न रखने के लिए कुछ शिष्टाचार नहीं दिखा सकते?’’