462 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
यह मानते हैं कि सभी संघर्ष, ऐसे युद्ध सहित भी हैं जो न्यायोचित कारण से
लड़े जाते हैं, वर्णित होने चाहिये?’’
- तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘वह जो दण्ड के योग्य है उसे अवश्य दण्डित किया
जाना चाहिये, और जो उपहार के योग्य है, उसे अवश्य ही उपहार दिया जाना
चाहिये। फिर भी किसी भी प्राणी को कोई हानि नहीं पहुँचनी चाहिये बल्कि प्रेम
एवं दयापूर्ण बर्ताव करना चाहिये। ये निषेधाज्ञायें परस्पर विरोधी नहीं है, क्योंकि जो
कोई भी अपराधों के लिये दण्डित किया जाता है। वह न्यायाधीश की द्वेष-भावना
से नहीं, बल्कि अपने बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप पीडि़त होता है। उसके अपने
कर्म ही उसके लिये वह कष्ट लाए हैं, जो कानून के न्यायाधीश द्वारा दिया गया
है। जब एक न्यायाधीश दण्ड देता है, उसके मन में दण्डनीय व्यक्ति के प्रति
द्वेष की भावना नहीं होनी चाहिये। यद्यपि एक हत्यारे को जब मृत्युदण्ड दिया जाये
उसे सोचना चाहिये कि यह उसके कर्मों का फल है। जितना शीघ्र वह यह समझ
जायेगा कि दण्ड उसकी अन्तर-मन को निर्मल बनाएगा तो कोई भी दण्डनीय
व्यक्ति अपने कर्म के फल को नहीं रोयेगा बल्कि उस पर प्रसन्न होगा।’’
- इन घटनाओं की उचित समझ यह दर्शायेगी कि तथागत द्वारा उपदेशित ‘अहिंसा’
मूलभूत थी, किन्तु वह निरपेक्ष नहीं थी।
- उन्होंने देखा कि बुराई को भलाई के द्वारा जीतना चाहिये। किन्तु उन्होंने यह कभी
नहीं उपदेश दिया कि बुराई को भलाई पर नियंत्रण कर लेने देना चाहिये।
- तथागत अहिंसा के पक्षधर थे और उन्होंने हिंसा की हमेशा निन्दा की थी। किन्तु
उन्होंने इससे इन्कार नहीं किया था कि भलाई को बुराई द्वारा नष्ट किये जाने
पर हिंसा अन्तिम आश्रय हो सकती है।
- इस प्रकार यह ऐसा नहीं था कि तथागत ने जिस खतरनाक सिद्धान्त की देशना
की थी। ये आलोचक ही हैं जो उसके औचित्य और उसके क्षेत्र को समझ
सकने में असफल रहे हैं।
4. शील का उपदेश देकर अंधकार (निराशा) उत्पन्न करने का
आरोप
(i) दुख को निराशा का कारण बताना
- कपिल द्वारा दिया गया दुख के मूल अर्थ का अभिप्राय चंचलता, अशान्ति,
उत्तेजना था।