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- प्रारम्भ में इस शब्द का तात्त्विक अर्थ (गूढ़ व रहस्यमय) था।
- बाद में इस शब्द को शारीरिक पीड़ा और मानसिक व्यथा के रूप में इसका
अर्थ ग्रहण कर लिया।
लेकिन दोनों अर्थ एक दूसरे से बहुत दूर-दूर नहीं थे। वे अत्यन्त समीप थे।
अशान्ति, पीड़ा और व्यथा को लाती है।
शीघ्र ही इसने सामाजिक और आर्थिक कारणों से उत्पन्न पीड़ा और व्यथा का
अर्थ ग्रहण कर लिया।
- भगवान् बुद्ध ने ‘दुःख’ शब्द को किन अर्थों में प्रयोग किया?
- भगवान बुद्ध के एक उपदेश से स्पष्ट हो जाता है कि बुद्ध को भली-भांति
ज्ञात था कि दरिद्रता दुख की जननी होती है।
- उस उपदेश में वे कहते हैं, ‘‘भिक्षुओ! क्या दरिद्रता एक संसारी आदमी के
लिये एक दुखपूर्ण वस्तु है?’
‘निश्चित रूप से, भगवान्!’’
‘‘और जब एक मनुष्य, दरिद्र एवं तंगहाल होता है, वह कर्ज में फंस जाता है
और क्या वह भी दुखपूर्ण स्थिति है।’’
‘‘निश्चित रूप से, भगवान्!’’
‘‘और जब वह कर्ज में फंस जाता है, वह उधार लेता है, और क्या वह भी
दुखद है?’’
‘‘निश्चित रूप से, भगवान्!’’
‘‘और जब कर्जा चुकाने का समय आता है, वह चुका नहीं पाता है और वे
लोग उस पर दबाव डालते हैं_ क्या वह भी दुखद है?’’
‘‘निश्चित रूप से, भगवान्!’’
‘‘और जब उस पर दबाव डाला जाता है, फिर भी वह नहीं चुका पाता है और
वे लोग उसे पीटते हैं, क्या वह भी दुखद है?’’
‘‘निश्चित रूप से, भगवान्!’’
‘‘और जब पीटा जाता है, वह नहीं चुका पाता है और वे लोग उसे बाँध देते
हैं, क्या वह भी दुखद है?’’
‘‘निश्चित रूप से, भगवान्!’’
‘‘इस प्रकार, भिक्षुओ! दरिद्रता, कर्ज, उधार, दबाव डाला जाना, पीटा जाना और