(iii) क्या बौद्ध धम्म निराशावादी है? - Page 494

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  1. यह आरोप प्रथम आर्य सत्य से उत्पन्न होता है, जो कहता है कि संसार में दुख

(चिन्ता-कष्ट) है।

  1. यह बल्कि आश्चर्यजनक है कि दुख के उल्लेख ने ऐसे एक आरोप को उत्पन्न

करने का अवसर प्रदान किया है।

  1. कार्ल मार्क्स ने भी कहा है कि संसार में शोषण है और अमीर और अधिक

अमीर तथा गरीब और अधिक गरीब बने जा रहे हैं।

  1. फिर भी किसी ने नहीं कहा है, कार्ल मार्क्स का सिद्धान्त निराशावादी है।
  2. तब एक भिन्न दृष्टिकोण भगवान् बुद्ध के सिद्धान्त के प्रति क्यों दर्शाया जाता है?
  3. ऐसा इसलिये हो सकता है, क्योंकि भगवान् बुद्ध के लिये कहा जाता है कि

उन्होंने अपने प्रथम उपदेश में ही कहा है, ‘‘जन्म दुख है, जरा (वृदावस्था)

दुख है, मृत्यु दुख है’’, इसलिये उनके धम्म को ही एक गहरी निराशावादी रंगत

दे दी गयी है।

  1. किन्तु जो साहित्यिक हैं, वे जानते हैं, यह अतिशयोक्ति का एक कौशल है और

यह साहित्यिक कला में निपुण लोगों द्वारा प्रभाव उत्पन्न करने के लिये प्रयोग

किया गया है।

  1. जन्म दुख है, बुद्ध द्वारा कही गयी एक अतिशयोक्ति है। इसे उनके एक प्रवचन

का उल्लेख कर सिद्ध किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने उपदेश दिया है कि

एक मनुष्य के रूप में जन्म अत्यन्त दुर्लभ वस्तु है।

  1. पुनः यदि बुद्ध ने केवल दुख का ही उल्लेख किया होता तो संभवतः ऐसा एक

आरोप सही माना जा सकता है।

  1. किन्तु बुद्ध का दूसरा आर्य सत्य जोर देता है कि इस दुख का अवश्य अन्त

होना ही चाहिये। उन्होंने दुख का अन्त करने के उद्देश्य से ही कर्त्तव्य पर जोर

देने के अस्तित्व की चर्चा की है।

  1. बुद्ध ने दुख को दूर करने की बात को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। यही कारण है

कि उन्होंने पाया कि कपिल ने केवल दुख की चर्चा की है और इसके विषय

में कुछ और नहीं कहा था, जिसके कारण उन्होंने असंतोष अनुभव किया और

मुनि आलार कालाम का आश्रम छोड़ दिया था।

  1. यह धम्म निराशावादी किस प्रकार कहला सकता है?

  2. निश्चित रूप से जो दुख का अन्त करने के लिये उत्सुक थे, ऐसे शास्ता के

ऊपर निराशावाद का आरोप नहीं लगाया जा सकता।